श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें[अध्याय ६ ] शाङ्करभाष्यार्थ २४३
वस्थितमशनायाद्यसंस्पृष्टं परमा- | रहित ज्ञानस्वरूपसे स्थित क्षुधादिसे
त्मानमविज्ञाय दुःखस्याध्यात्मि- | असंस्पृष्ट परमात्माको बिना जाने भी
कस्याधिभौतिकस्याधिदैविकस्या- | आध्यात्मिक, आधिभौतिक एवं आधि-
न्तो विनाशो भविष्यति । आत्मा- | दैविक दुःखका अन्त—विनाश हो
ज्ञाननिमित्तत्वात्संसारस्य । | जायगा; क्योंकि आत्माके अज्ञानसे
| ही संसारकी स्थिति है।
यावत्परमात्मानमात्मत्वेन न | तात्पर्य यह है कि जबतक पुरुष
जानाति तावत्तापत्रयाभिभूतो | परमात्माको आत्मस्वरूपसे नहीं
| जानता तबतक वह अजन्मा होनेपर
मकरादिभिरिव रागादिभिरि- | भी तापत्रयसे अभिभूत हो मकरादि-
तस्ततः कृष्यमाणः प्रेततिर्यङ्मनु- | के समान रागादिद्वारा इधर-उधर
ष्यादियोनिष्वज एव जीवभाव- | खींचा जाता हुआ प्रेत, तिर्यक् एवं
मापन्नो मोमुह्यमानः संसरति । | मनुष्यादि योनियोंमें जीवभावको प्राप्त
यदा पुनरपूर्वमनपरं नेति नेती- | हो अत्यन्त मोहवश संसारमें भटकता
त्यादिलक्षणमशनायाद्यसंस्पृष्टमनु- | रहता है। किन्तु जिस समय वह
दितानस्तमितज्ञानात्मनावस्थितं | कारण-कार्यभावसे रहित, नेति-नेति
पूर्णानन्दं परमात्मानमात्मत्वेन | आदि वाक्यद्वारा लक्षित, क्षुधादिसे
| असंस्पृष्ट, उदय-अस्तसे रहित ज्ञान-
साक्षाज्जानाति तदा निरस्ताज्ञान- | स्वरूपसे स्थित पूर्णानन्दमय परमात्मा-
तत्कार्यः पूर्णानन्दो भवतीत्यर्थः । | को साक्षात् आत्मस्वरूपसे जानता
उक्तं च— | है उस समय अज्ञान और उसके
“अज्ञानेनावृतं ज्ञानं | कार्यसे छूटकर पूर्णानन्दमय हो
तेन मुह्यन्ति जन्तवः । | जाता है। कहा भी है—
ज्ञानेन तु तदज्ञानं | “ज्ञान अज्ञानसे ढका हुआ है,
येषां नाशितमात्मनः ॥ | इसीसे जीव मोहमें पड़ते हैं।
| जिन्होंने ज्ञानके द्वारा अपने अज्ञान-
| को नष्ट कर दिया है उनके प्रति वह