श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२२८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [अध्याय ६
तमीश्वराणामिति । तमीश्वराणां | 'तमीश्वराणाम्' इत्यादि । उस
वैवस्वतयमादीनां परमं महेश्वरं | वैवस्वत यमादि ईश्वरों (लोकपालों)
तं देवतानामिन्द्रादीनां परमं च | के परम महेश्वर, इन्द्रादि देवताओंके
दैवतं पतिं पतीनां प्रजापतीनां | परम देव, पतियों—प्रजापतियोंके
परमं परस्तात्परतोऽक्षरात् । | परम पति, पर—अक्षरसे पर,
वदाम देवं द्योतनात्मकं भुवना- | भुवनोंके ईश्वर, देव—द्योतनात्मक,
नाधीशं भुवनेशम् । ईड्यं स्तु- | ईड्य-स्तुत्य [ परमात्माको ] हम
त्यम् ॥७॥ | जानते हैं ॥७॥
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परमेश्वरकी महत्ता
कथं महेश्वरत्वम् ? इत्याह— | उसकी महेश्वरता किस प्रकार है, सो बतलाते हैं—
न तस्य कार्यं करणं च विद्यते
न तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते ।
परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते
स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च ॥८॥
उसके शरीर और इन्द्रियाँ नहीं हैं, उसके समान और उससे बढ़-
कर भी कोई दिखायी नहीं देता, उसकी पराशक्ति नाना प्रकारकी ही सुनी
जाती है और वह स्वाभाविकी ज्ञानक्रिया और बलक्रिया है ॥८॥
न तस्येति । न तस्य कार्यं | 'न तस्य' इत्यादि । उसके
शरीरं करणं चक्षुरादि विद्यते । न | कार्य—शरीर और करण—चक्षु
आदि इन्द्रियाँ नहीं हैं । उसके
तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते श्रूयते | समान और उससे बढ़कर भी कोई
देखा या सुना नहीं जाता । उसकी
वा । परास्य शक्तिर्विविधैव | पराशक्ति नाना प्रकारकी ही सुनी जाती