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सर्वकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

पृष्ठ 214, कुल 276 में से

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पृष्ठ 214

२०० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ४
येन चक्षूंषि पश्यति" (के० उ० | जिसकी सत्तासे नेत्र देखता है"
१।६) इत्यादिश्रुतेः । हृदा | इत्यादि श्रुति इसमें प्रमाण है । जो
शुद्धबुद्धयैतद्व्याख्यातं मनसेति | साधनचतुष्टयादिसम्पन्न संन्यासी यानी
हृदिस्थं हृदाकाशगुहास्थं प्रत्य- | योग्य अधिकारी हृदयस्थित—हृदया-
क्तया तत्रावस्थितं ये साधन- | काशरूप गुहामें स्थित अर्थात् वहाँ
चतुष्टयादियुक्ताः संन्यासिनो | प्रत्यक्रूपसे विद्यमान इस प्रकृत
योग्याधिकारिण एनं प्रकृतं ब्रह्मा- | ब्रह्मरूप आत्माको हृदय—शुद्धबुद्धि-
त्मानमेवमित्थं ब्रह्माहमस्मीत्य- | से, इसीकी व्याख्या करके कहते हैं
परोक्षेण विदुर्जानान्ति तेऽपरोक्षी- | 'मनसे' इस प्रकार प्रत्यक्षरूपसे जानते
करणमहिम्नामृता भवन्त्यमरण- | हैं कि 'मैं ब्रह्म हूँ' वे उस साक्षात्कार-
धर्माणो भवन्ति । मरणहेत्वविद्या- | की महिमासे अमृत—अमरणधर्मा
देस्तत्त्वज्ञानाग्निना दग्धत्वात्पुन- | हो जाते हैं । तात्पर्य यह है कि
र्देहान्तरं न भजन्तीत्यर्थः ॥२०॥ | मरणके हेतुभूत अज्ञानादिका तत्त्व-
ज्ञानरूप अग्निसे दाह हो जानेके
कारण वे पुनः अन्य देह धारण
नहीं करते ॥२०॥
परमेश्वरका स्तवन
इदानीं तत्प्रसादादेवेष्टप्राप्ति- | अब यह मानकर कि उसीकी
परिहाराविति मत्वा तमेव परमेश्वरं | कृपासे इष्टप्राप्ति और अनिष्टनिवृत्ति
हो सकती हैं दो मन्त्रोंसे उस परमे-
प्रार्थयते मन्त्रद्वयेन— | श्वरकी ही स्तुति करते हैं—
अजात इत्येवं कश्चिद्भीरुः प्रपद्यते ।
रुद्र यत्ते दक्षिणं मुखं तेन मां पाहि नित्यम् ॥२१॥
हे रुद्र ! तुम अजन्मा हो, इसलिये कोई [मुझ-जैसा] संसारभयसे
कातर पुरुष तुम्हारी शरण लेता है [और कहता है कि] तुम्हारा जो
दक्षिण मुख है उससे मेरी सर्वदा रक्षा करो ॥ २१ ॥