श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 197, कुल 276 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ४ ] · ·शाङ्करभाष्यार्थ १८३
यस्मिन्देवा अधि विश्वे निषेदुः— | परब्रह्ममें, जिसमें समस्त देवगण
आश्रितास्तिष्ठन्ति । यस्तं | अधिष्ठित हैं—उसके आश्रयसे स्थित हैं
परमात्मानं न वेद किमृचा | उस परमात्माको जो नहीं जानता
करिष्यति ? य इत्तद्विदुस्त इमे | वह वेदसे क्या कर लेगा ? और जो
समासते—कृतार्थास्तिष्ठन्ति ॥८॥ | उसे जानते हैं वे तो ये सम्यक् प्रकारसे रहते हैं अर्थात् कृतार्थ हुए स्थित हैं ॥ ८ ॥
मायोपाधिक ईश्वर ही सबका स्रष्टा है
इदानीं तस्यैवाक्षरस्य मायोपाधिकं जगत्स्रष्टृत्वं तन्निमित्तत्वं च भेदेन दर्शयति— | अब श्रुति उस अक्षर परमात्माका ही मायारूप उपाधिके कारण जगत्स्रष्टृत्वं और जगन्निमित्तत्वं अलग-अलग दिखलाती है—
छन्दांसि यज्ञाः क्रतवो व्रतानि
भूतं भव्यं यच्च वेदा वदन्ति ।
अस्मान्मायी सृजते विश्वमेत-
त्तस्मिंश्चान्यो मायया संनिरुद्धः ॥ ६ ॥
वेद, यज्ञ, क्रतु, व्रत, भूत, भविष्य और वर्तमान तथा और भी जो कुछ वेद बतलाते हैं वह सब मायावी ईश्वर इस अक्षरसे ही उत्पन्न करता है, और उस ( प्रपञ्च ) में ही मायासे अन्य-सा होकर बँधा हुआ है ॥ ९ ॥
छन्दांसीति । छन्दांसि ऋग्यजुःसामाथर्वाङ्गिरसाख्या वेदाः । | ‘छन्दांसि’ इत्यादि । ऋग्, यजुः, साम और अथर्वसंज्ञक वेद छन्द हैं,
देवयज्ञादयो यूपसंबन्धरहितवि- | जिनमें यूपका सम्बन्ध नहीं होता वे देवयज्ञादि विहित कर्म यज्ञ कहलाते
१. जगत्का उपादानकारणत्व । २. जगत्का निमित्तकारणत्व ।