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सर्वकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

पृष्ठ 194, कुल 276 में से

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पृष्ठ 194

१८० श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ४
तत्रैवं सति— | ऐसा होनेपर—
समाने वृक्षे पुरुषो निमग्नो-
ऽनीशया शोचति मुह्यमानः ।
जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीश-
मस्य महिमानमिति वीतशोकः ॥ ७ ॥
उस एक ही वृक्षपर जीव [ देहात्मभावमें ] डूबकर मोहग्रस्त हो
दीनभावसे शोक करता है । जिस समय यह [ अनेकों योगमार्गोसे ]
सेवित और देहादिसे भिन्न ईश्वर और उसकी महिमाको देखता है उस
समय शोकरहित हो जाता है ॥ ७ ॥
समाने वृक्षे शरीरे पुरुषो | एक ही वृक्ष यानी शरीरमें पुरुष
| —भोक्ता जीव अविद्या, काम, कर्म,
भोक्ताविद्याकामकर्मफलरागादि- | कर्मफल और रागादिके भारी भारसे
गुरुभाराक्रान्तोऽलाबुरिव समुद्र- | आक्रान्त हो समुद्रके जलमें डूबे हुए
| तूँबेके समान यानी निश्चय ही
जले निमग्नो निश्चयेन देहात्म- | देहात्मभावको प्राप्त हुआ—'यह
भावमापन्नः'अयमेवाहममुष्य पुत्रो- | देह मैं हूँ, मैं अमुकका पुत्र हूँ,
| उसका नाती हूँ, कृश हूँ, स्थूल हूँ,
ऽस्य नप्ता कृशः स्थूलो गुणवान्नि- | गुणवान् हूँ, गुणहीन हूँ, सुखी हूँ,
र्गुणः सुखी दुःखी'इत्येवंप्रत्ययो | दुःखी हूँ' इस प्रकारके प्रत्ययोंवाला
| हो, ऐसा समझकर कि इस देहसे
नान्योऽस्त्यस्मादिति जायते म्रि- | भिन्न कोई और नहीं है जन्मता,
यते संयुज्यते च संबन्धिवान्धवैः। | मरता एवं अपने सम्बन्धी वन्धुओंसे
| संयुक्त होता है । अतः अनीशतासे
अतोऽनीशया 'न कस्यचित्सम- | —'मैं किसी कार्यके लिये समर्थ नहीं
र्थोऽहं पुत्रो मम नष्टो मृता मे | हूँ, मेरा पुत्र नष्ट हो गया, स्त्री मर