श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 190, कुल 276 में से
संदर्भ में पढ़ें१७६ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ४
शुद्धमन्यदपि दीप्तिमन्नक्षत्रादि । तथा और भी जो दीप्तिशाली
नक्षत्रादि पदार्थ हैं वह भी वही है,
तद्ब्रह्म हिरण्यगर्भात्मा तदापः स तथा वही ब्रह्म—हिरण्यगर्भस्वरूप
है, वही जल है और वही विराट्-
प्रजापतिर्विराडात्मा ॥ २ ॥ रूप प्रजापति है ॥ २ ॥
त्वं स्त्री त्वं पुमानसि त्वं कुमार उत वा कुमारी ।
त्वं जीर्णो दण्डेन वञ्चसि त्वं जातो भवसि विश्वतोमुखः ॥ ३॥
तू स्त्री है, तू पुरुष है, तू ही कुमार या कुमारी है और तू ही वृद्ध
होकर दण्डके सहारे चलता है तथा तू ही [ प्रपञ्चरूपसे ] उत्पन्न होने-
पर अनेकरूप हो जाता है ॥ ३ ॥
स्पष्टो मन्त्रार्थः ॥ ३ ॥ | इस मन्त्रका अर्थ स्पष्ट है ॥ ३॥
नीलः पतङ्गो हरितो लोहिताक्ष-
स्तडिद्गर्भ ऋतवः समुद्राः ।
अनादिमत्त्वं विभुत्वेन वर्तसे
यतो जातानि भुवनानि विश्वा ॥ ४ ॥
तू ही नीलवर्ण भ्रमर, हरितवर्ण एवं लाल आँखोंवाला जीव ( शुकादि
निकृष्ट प्राणी ), मेघ तथा [ ग्रीष्मादि ] ऋतु और [ सप्त ] समुद्र है ।
तू अनादि है और सर्वत्र व्याप्त होकर स्थित है तथा तुझहीसे सम्पूर्ण लोक
उत्पन्न हुए हैं ॥ ४ ॥
नील इति । त्वमेवेति सर्वत्र 'नीलः' इत्यादि । यहाँ 'त्वमेव'
( तू ही ) इस पदका सबके साथ
संबध्यते । त्वमेव नीलः पतङ्गो सम्बन्ध है । तू ही नीलवर्ण पतङ्ग-