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सर्वकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

पृष्ठ 182, कुल 276 में से

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पृष्ठ 182

१६८ श्ववेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ३
सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् ।
सर्वस्य प्रभुमीशानं सर्वस्य शरणं बृहत् ॥१७॥
वह समस्त इन्द्रियवृत्तियोंके रूपमें अवभासित होता हुआ भी समस्त
इन्द्रियोंसे रहित है, तथा सबका प्रभु, शासक और सबका आश्रय एवं
कारण है ॥ १७ ॥
सर्वेन्द्रियेति । सर्वाणि च तानी- | 'सर्वेन्द्रिय०' इत्यादि । श्रोत्रादि
न्द्रियाणि श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्य- | इन्द्रियोंसे लेकर अन्तःकरणपर्यन्त
न्तःकरणपर्यन्तानि सर्वेन्द्रियग्रह- | जो समस्त इन्द्रियाँ हैं वे सर्वेन्द्रिय-पदके ग्रहणसे गृहीत होती हैं ।
णेन गृह्यन्ते । अन्तःकरणबहि- | अन्तःकरण और बाह्य करण जिसकी
ष्करणोपाधिभूतः सर्वेन्द्रियगुणै- | उपाधि हैं वह परमात्मा उन समस्त
रध्यवसायसंकल्पश्रवणादिभिर्गुण- | इन्द्रियोंके अध्यवसाय, संकल्प एवं
वदाभासत इति सर्वेन्द्रियगुणा- | श्रवणादि गुणोंसे गुणवान्-सा भासता है । इसलिये वह सर्वेन्द्रियगुणाभास
भासम् । सर्वेन्द्रियैर्व्यापृतमिव | है । तात्पर्य यह है कि उसे समस्त
तज्ज्ञेयमित्यर्थः । "ध्यायतीव | इन्द्रियसे व्यापारयुक्त-सा जानना
लेलायतीव" (बृ० उ० ४।३।७) | चाहिये; जैसा कि "ध्यान करता हुआ-सा, चेष्टा करता हुआ-सा"
इति श्रुतेः । कस्मात्पुनः कारणा- | इत्यादि श्रुतिसे ज्ञात होता है ।
तद्व्यापृतमिवेति गृह्यते ? इत्याह- | किन्तु वह किस कारणसे व्यापारयुक्त-सा ग्रहण किया जाता है [ वास्तवमें
'सर्वेन्द्रियविवर्जितम्' सर्वकरण- | व्यापार करता है-ऐसा क्यों नहीं माना जाता ? ] इसपर श्रुति कहती
रहितमित्यर्थः । अतो न च | है--'सर्वेन्द्रियविवर्जितम्' अर्थात् वह समस्त इन्द्रियोंसे रहित है ।
करणव्यापारैर्व्यापृतं तज्ज्ञेयम् । | अतः उसे इन्द्रियोंके व्यापारोंसे व्यापारवान् नहीं जानना चाहिये ।