सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

पृष्ठ 176, कुल 276 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 176

१६२ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय ३
ततो यदुत्तरतरं तद्रूपमनामयम् । य एतद्विदुर-
मृतास्ते भवन्त्यथेतरे दुःखमेवापियन्ति ॥ १० ॥
उस (कारण-ब्रह्म) से जो उत्कृष्टतर है वह अरूप और अनामय
है। उसे जो जानते हैं वे अमर हो जाते हैं, तथा अन्य दुःखको ही प्राप्त
होते हैं ॥ १० ॥
तत इति। तत इदंशब्दवाच्या- | 'ततः' इत्यादि । उससे अर्थात्
| इदंशब्दवाच्य जगत्से उत्कृष्ट तो
ज्जगत उत्तरं कारणं ततोऽप्युत्तरं | उसका कारण है और उससे भी
कार्यकारणविनिर्मुक्तं ब्रह्मैव | उत्कृष्टतर कार्य-कारणभावशून्य ब्रह्म
| ही है । वह अरूप - रूपादि-
इत्यर्थः । तदरूपं रूपादिरहितम्, | रहित और आध्यात्मिकादि त्रिविध
अनामयमाध्यात्मिकादितापत्रय- | तापोंसे रहित होनेके कारण अनामय
| (दुःखहीन) है। जो इसे जानते
रहितत्वात् । य एतद्विदुरमृतत्वेन | हैं अर्थात् अपने अमृतस्वरूपसे 'मैं
अहमस्मीत्यमृता अमरणधर्माणस्ते | यही हूँ' ऐसा अनुभव करते हैं वे
| अमृत - अमरणधर्मा हो जाते हैं।
भवन्ति । अथेतरे ये न विदुस्ते | और अन्य जो ऐसा नहीं जानते वे
दुःखमेवापियन्ति ॥ १० ॥ | दुःखको ही प्राप्त होते हैं ॥१०॥
इदानीं तस्यैव सर्वात्मत्वं | अब श्रुति उसीकी सर्वात्मकता
दर्शयति— | दिखलाती है—
सर्वाननशिरोग्रीवः सर्वभूतगुहाशयः ।
सर्वव्यापी स भगवांस्तस्मात्सर्वगतः शिवः ॥११॥
वह भगवान् समस्त मुखोंवाला, समस्त शिरोंवाला और समस्त
ग्रीवाओंवाला है, वह सम्पूर्ण जीवोंके अन्तःकरणोंमें स्थित और सर्वव्यापी
है; इसलिये सर्वगत और मङ्गलरूप है ॥ ११ ॥