श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 167, कुल 276 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ १५३
और सम्पूर्ण लोकोंकी रचना कर उनका रक्षक होकर प्रलयकालमें उन्हें
संकुचित कर लेता है ॥ २ ॥
[मूल संस्कृत शाङ्करभाष्य]
एको हीति । हिशब्दो यस्मा-
दर्थे । यस्मादेक एव रुद्रः स्वतो
न द्वितीयाय वस्त्वन्तराय तस्थु-
र्ब्रह्मविदः परमार्थदर्शिनः । उक्तं
च—एको रुद्रो न द्वितीयाय
तस्थुरिति । य इमाँल्लोकानीशते
नियमयतीशनीभिः । सर्वांश्च जना-
न्प्रत्यन्तरः प्रतिपुरुषमवस्थितः ।
रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूवेत्यर्थः ।
किञ्च, संचुकोच अन्तकाले
प्रलयकाले । किं कृत्वा ? संसृज्य
विश्वा भुवनानि गोपा गोप्ता
भूत्वा । एतदुक्तं भवति—अद्वि-
तीयः परमात्मा, न चासौ कुम्भ-
कारवदात्मानं केवलं मृत्पिण्ड-
स्थानीयमुपादानकारणमुपादत्ते ।
किं तर्हि ? स्वशक्तिविक्षेपं कुर्वन्स्रष्टा
नियन्ता वाभिधीयत इति । उत्तरो
मन्त्रस्तस्यैव विराडात्मनावस्थानं
[हिन्दी अनुवाद]
'एको हि' इत्यादि । क्योंकि
एक ही रुद्र है, अतः परमार्थदर्शी
ब्रह्मविद्गण स्वतः किसी दूसरी वस्तु-
के लिये अपेक्षा नहीं करते । यहाँ
'हि' शब्द 'यस्मात्' ( क्योंकि )
के अर्थमें है । इसीसे कहा है 'एको
रुद्रो न द्वितीयाय तस्थुः ।' जो
अपनी शक्तियोंद्वारा इन लोकोंका
शासन-नियमन करता है । वह
समस्त जीवोंके भीतर अर्थात् प्रत्येक
पुरुषमें स्थित है । तात्पर्य यह है
कि प्रत्येक रूपके अनुरूप हो
रहा है ।
तथा वह अन्तकाल यानी प्रलय-
कालमें संकुचित करता है। क्या करके?
सम्पूर्ण लोकोंकी रचना कर उनका
गोपा-रक्षक होकर । यहाँ यह कहा
गया है कि परमात्मा अद्वितीय है,
वह कुम्हारकी तरह मृत्पिण्डरूप
अपने-आपको उपादान कारणरूपसे
ग्रहण नहीं करता; तो फिर क्या
करता है ? वह अपनी शक्तिको
क्षुब्ध करनेसे ही जगत्का रचयिता
या नियन्ता कहा जाता है । अगला
मन्त्र उसीकी विराड्रूपसे स्थिति