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सर्वकोश
श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

श्वेताश्वतरोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Shvetashvatara Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished276 पृष्ठ

पृष्ठ 162, कुल 276 में से

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पृष्ठ 162

१४८ श्वेताश्वतरोपनिषद् [ अध्याय २
यदात्मतत्त्वेन तु ब्रह्मतत्त्वं
दीपोपमेनेह युक्तः प्रपश्येत् ।
अजं ध्रुवं सर्वतत्त्वैर्विशुद्धं
ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ॥१५॥
जिस समय योगी दीपकके समान प्रकाशस्वरूप आत्मभावसे ब्रह्म-
तत्त्वका साक्षात्कार करता है उस समय उस अजन्मा, निश्चल और समस्त
तत्त्वोंसे विशुद्ध देवको जानकर वह सम्पूर्ण बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है ॥१५॥
यदेति । यदा यस्यामवस्था- | 'यदा' इत्यादि । जिस समय
यामात्मतत्त्वेन स्वेनात्मना । किं- | अर्थात् जिस अवस्थामें आत्मतत्त्व-
| से--अपने आत्मस्वरूपसे, कैसे
विशिष्टेन ? दीपोपमेन दीपस्था- | आत्मस्वरूपसे ? दीपोपम--दीपक-
| स्थानीय अर्थात् प्रकाशस्वरूपसे ब्रह्म-
नीयेन प्रकाशस्वरूपेण ब्रह्मतत्त्वं | तत्त्वका साक्षात्कार करता है । यहाँ
प्रपश्येत् । तुशब्दोऽवधारणे । | 'तु' शब्द निश्चयार्थक है । अतः
| तात्पर्य यह है कि परमात्माको
परमात्मानमात्मनैव जानीयादि- | आत्मभावसे ही जानना चाहिये ।
| कहा भी है—"उसने आत्माको ही
त्यर्थः । उक्तं च—"तदात्मान- | जाना कि मैं ब्रह्म हूँ।" कैसे ब्रह्मका
मेवावेदहं ब्रह्मास्मि” ( बृ० उ० | साक्षात्कार करता है ?--जो किसी
१।४।१०) इति । कीदृ- | अन्यसे उत्पन्न नहीं हुआ, ध्रुव
| अर्थात् अपने स्वरूपसे च्युत नहीं
शम् ? अन्यस्मादजायमानं ध्रुवम- | होता और सम्पूर्ण तत्त्वों यानी
प्रच्युतस्वरूपं सर्वतत्त्वैरविद्यात- | अविद्या और उसके कार्योंसे विशुद्ध-
| असंस्पृष्ट है; उस देवको जानकर
त्कार्यैर्विशुद्धमसंस्पृष्टं ज्ञात्वा देवं | जीव अविद्यादि समस्त पाशोंसे मुक्त
मुच्यते सर्वपाशैरविद्यादिभिः।१५। | हो जाता है ॥ १५ ॥