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सर्वकोश
शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

श्रीमती हिमांशु द्विवेदी द्वारा

DevanagariHindipublished208 पृष्ठ

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को उस श्राद्ध में यथेष्ट भोजन कराया। इसके बाद अलक्षित उन चारों को पृथक्-पृथक परम मधुर स्वादिष्ट भोजन दिया गया। भोजन करते बनिये ने फू-फू ध्वनि किया। तब ऊपर स्थित ग्राममुख्य ने सर्पिणी की शंङ्का से भय से पेशाब कर दिया। बनिये ने घृत समझकर बर्तन को ऊपर उछाला और वह बर्तन ऊपर स्थित ग्राममुख्य के मुँह में लगा।

उससे वह शंङ्कित हो 'लग्नम्-लग्नम् कहता हुआ 'झम्' से कूद कर निकल गया। दूसरे भी 'लग्नम' इस शब्द से भय विह्वल हो बाहर निकले, जिससे शंकर तथा अन्य लोग विस्मयपूर्वक बहुत हँसे। तब उसने पत्नी से पूछा यह क्या? तब पत्नी ने कहा आपने श्राद्ध-श्रद्धा से नही किया इसलिए तुम्हारे पितर भूख से पीड़ित बाहर निकल आये। तब उसने फिर से श्राद्ध किया और इधर रम्भिका के कहने से वे लोग निकल गये।

कथा- 34

"शम्भु ब्राह्मण की पारडी (साड़ी) की कथा"

प्राचीन काल में एक नगर मे शम्भु नामक एक जुआरी विप्र रहता था। एक दिन नाना देश में घूमने वाले उस विप्र ने मार्ग में जाते हुए, खेती की रखवाली करती एक सुन्दर बालिका को देखकर, ताम्बूल देते हुए कहा कि-तुम यह साड़ी ग्रहण करो और मेरे साथ सम्भोग करो।

उसने बडे सुख से वैसा किया। जब रति कार्य पूरा हो गया तब वह विप्र साडी वापस माँगने लगा।

उसके माँगने पर कुछ न बोलते हुए वह घर की ओर चल पड़ी और वह ब्राह्मण भी अनाज की चार बालियाँ लेकर उसके पीछे चल पड़ा। गाँव में पहुँचकर विप्र ने कहा गाँव वालो देखो अनाज की चार बालियों के कारण इसने मेरा वस्त्र छीन लिया है।

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