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सर्वकोश
शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

श्रीमती हिमांशु द्विवेदी द्वारा

DevanagariHindipublished208 पृष्ठ

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(3) धीरोदात्त :

उत्कृष्ट अन्त.करण वाला, अत्यन्त गम्भीर, क्षमाशील, आत्मश्लाघा न करने वाला, स्थिर अहभाव को दबाकर रखने वाला, दृढ़व्रती नायक धीरोदात्त कहलाता है। अर्थात् जिसका अन्त.करण शोक, क्रोध आदि से अभिभूत नही होता, अपनी प्रशंसा स्वय न करने वाला, उसका गर्व नम्रता से छिपा रहता है, जो स्वीकृत बात का निर्वाह करता है इस प्रकार का नायक धीरोदात्त नायक होता है। यथा - राजाविक्रमादित्य (कथा नं० 9) धीरोदात्त कोटि का नायक है।

(4) धीरोद्धत्त :

जिसमे घमण्ड और डाह अधिक होता है, जो माया और कपट में तत्पर होता है, अहंकारी, चंचल, क्रोधी तथा आत्मश्लाघा करने वाला है, वह धीरोद्धत्त नायक है। दर्प, शूरता इत्यादि का घमण्ड मात्सर्य (दूसरों की समृद्धि को) न सहना, मन्त्र की शक्ति से अविद्यमान वस्तु को प्रकट कर देना माया कहलाती है और किसी को छलना मात्र ही छद्म है, चल का अर्थ है- अस्थिर (चञ्चल), चण्ड- क्रोधयुक्त, विकत्थन अपने गुणों की प्रशंसा करने वाला, ऐसा धीरोद्धत नायक होता है। यथा- रावण, परशुराम आदि धीरोद्धत कोटि के नायक है।

इसी प्रकार शुकसप्तति ग्रन्थ मे विष्णु नामक पात्र (कथा न० 44) में धीरोद्धत कोटि का नायक है।

शृंगार रस सम्बन्धी अवस्थाओ के आधार पर नायक के चार भेद किये जा सकते है। (1) अनुकूल, (2) दक्षिण, (3) धृष्ट, (4) शठ¹ जिस नायक की एक ही नायिका होती है वह अनुकूल नायक है।² जैसे- शुकसप्तति का प्रमुख पात्र मदन विनोद, माधव सेठ (कथा नं० 32), महाधन वणिक् (कथा नं० 29), आर्य नामक वणिक्


1 सा०द० 3/35
2 “डनुकूलस्त्वेकनायिक.” । दशरूपक द्वितीय प्रकाश 11 वीं कारिका

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