शृंगार शतक
Shringar Shatak
भर्तृहरि / अनुवादक: हरिदास वैद्य द्वारा
स्रोत: Shringar Shatak - Haridas Vaidya · हरिदास एण्ड कम्पनी, कलकत्ता / Digital Library of India (उद्गम)
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तेरे कटाक्षके जादूसे ही मुझे यह उन्माद रोग हो गया है ।
इसमें मेरे दिलका क्या अपराध ? मैं तेरी गलीमें आकर बैठ
गया, क्योंकि इसके सिवा इस उन्मादके दूर करनेका और उपाय
ही न था ।
न देखलीं कैसी-कैसी आफ़त ।
जहाँमें हमने तुम्हारे बाइस ॥
और आगे क्या-क्या गुमो आलम ।
हम तुम्हारी दौलत न देख लेंगे ॥—जौक ।
हमने दुनियामें तुम्हारी वजहसे कैसी-कैसी आफ़तें नहीं
भोगी हैं । और आगे भी तुम्हारी बदौलत हमें क्या-क्या शोक-
राम न उठाने होंगे ।
महरबानीकी एक राह तो हो ।
गर सतानेके हैं हजार तरीक़ ॥ दाग ।
अगर तकलीफ़ देने या सतानेके हजार तरीक़े हैं, तो मिहर-
बानीका भी एकाध तरीका होना चाहिये ।
सराव न हो जिससे, कोई तिशनये मकसूद ।
ऐ जौक ! वह आबेवका भी है तो क्या है ॥—जौक ।
जिससे किसी प्यासेकी प्यास न बुझे, वह अमृत भी है तो
किस कामका ? आप कितनी ही सुन्दर हैं, पर आपसे अगर
मेरी प्यास न बुझी, तो आपकी सुन्दरतासे क्या ?