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सर्वकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

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पृष्ठ 893

प्रसन्न रहोगी। तुम्हारे रूप-रंग उन्हींके योग्य निर्मल हैं॥ १० ॥

‘कुरूप, ओछी, विकृत, धँसे हुए पेटवाली और वृद्धा भार्याको त्यागकर ये तुम्हें ही सादर ग्रहण करेंगे*॥ ११ ॥

‘सुन्दर कटिप्रदेशवाली वरवर्णिनि! कौन ऐसा बुद्धिमान् मनुष्य होगा, जो तुम्हारे इस श्रेष्ठ रूपको छोड़कर मानवकन्याओंसे प्रेम करेगा?’॥ १२ ॥

लक्ष्मणके इस प्रकार कहनेपर परिहासको न समझनेवाली उस लंबे पेटवाली विकराल राक्षसीने उनकी बातको सच्ची माना॥ १३ ॥

वह पर्णशालामें सीताके साथ बैठे हुए शत्रुसंतापी दुर्जय वीर श्रीरामचन्द्रजीके पास लौट आयी और कामसे मोहित होकर बोली—॥ १४ ॥

‘राम! तुम इस कुरूप, ओछी, विकृत, धँसे हुए पेटवाली और वृद्धाका आश्रय लेकर मेरा विशेष आदर नहीं करते हो॥ १५ ॥

‘अतः आज तुम्हारे देखते-देखते मैं इस मानुषीको खा जाऊँगी और इस सौतके न रहनेपर तुम्हारे साथ सुखपूर्वक विचरण करूँगी’॥ १६ ॥

ऐसा कहकर दहकते हुए अंगारोंके समान नेत्रोंवाली शूर्पणखा अत्यन्त क्रोधमें भरकर मृगनयनी सीताकी ओर झपटी, मानो कोर्इ बड़ी भारी उल्का रोहिणी नामक तारेपर टूट पड़ी हो॥ १७ ॥

महाबली श्रीरामने मौतके फंदेकी तरह आती हुर्इ उस राक्षसीको हुंकारसे रोककर कुपित हो लक्ष्मणसे कहा— ‘सुमित्रानन्दन! क्रूर कर्म करनेवाले अनार्योंसे किसी प्रकारका परिहास भी नहीं करना चाहिये। सौम्य! देखो न, इस समय सीताके प्राण किसी प्रकार बड़ी मुश्किलसे बचे हैं॥ १९ ॥

‘पुरुषसिंह! तुम्हें इस कुरुपा, कुलटा, अत्यन्त मतवाली और लंबे पेटवाली राक्षसीको कुरूप—किसी अङ्गसे हीन कर देना चाहिये’॥ २० ॥

श्रीरामचन्द्रजीके इस प्रकार आदेश देनेपर क्रोधमें भरे हुए महाबली लक्ष्मणने उनके देखते-देखते म्यानसे तलवार खींच ली और शूर्पणखाके नाक-कान काट लिये॥

नाक और कान कट जानेपर भयंकर राक्षसी शूर्पणखा बड़े जोरसे चिल्लाकर जैसे आयी थी, उसी तरह वनमें भाग गयी॥ २२ ॥