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सर्वकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

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पृष्ठ 661

हैं?॥ ११ ॥

‘महाराज (पिताजी) प्रायः माताजीके ही महलमें रहा करते थे, किंतु आज मैं उन्हें यहाँ नहीं देख रहा हूँ। मैं उन्हींका दर्शन करनेकी इच्छासे यहाँ आया हूँ॥

‘मैं पूछता हूँ, बताओ, पिताजी कहाँ हैं? मैं उनके पैर पकडूँगा। अथवा बड़ी माता कौसल्याके घरमें तो वे नहीं हैं?’॥ १३ ॥

कैकेयी राज्यके लोभसे मोहित हो रही थी। वह राजाका वृत्तान्त न जाननेवाले भरतसे उस घोर अप्रिय समाचारको प्रिय-सा समझती हुई इस प्रकार बताने लगी— ॥ १४ ॥

‘बेटा! तुम्हारे पिता महाराज दशरथ बड़े महात्मा, तेजस्वी, यज्ञशील और सत्पुरुषोंके आश्रयदाता थे। एक दिन समस्त प्राणियोंकी जो गति होती है, उसी गतिको वे भी प्राप्त हुए हैं’॥ १५ ॥

भरत धार्मिक कुलमें उत्पन्न हुए थे और उनका हृदय शुद्ध था। माताकी बात सुनकर वे पितृशोकसे अत्यन्त पीड़ित हो सहसा पृथ्वीपर गिर पड़े और ‘हाय, मैं मारा गया!’ इस प्रकार अत्यन्त दीन और दुःखमय वचन कहकर रोने लगे। पराक्रमी महाबाहु भरत अपनी भुजाओंको बारम्बार पृथ्वीपर पटककर गिरने और लोटने लगे॥ १६-१७ ॥

उन महातेजस्वी राजकुमारकी चेतना भ्रान्त और व्याकुल हो गयी। वे पिताकी मृत्युसे दुःखी और शोकसे व्याकुलचित्त होकर विलाप करने लगे— ॥ १८ ॥

‘हाय! मेरे पिताजीकी जो यह अत्यन्त सुन्दर शय्या पहले शरत्कालकी रातमें चन्द्रमासे सुशोभित होनेवाले निर्मल आकाशकी भाँति शोभा पाती थी, वही यह आज उन्हीं बुद्धिमान् महाराजसे रहित होकर चन्द्रमासे हीन आकाश और सूखे हुए समुद्रके समान श्रीहीन प्रतीत होती है’॥ १९-२० ॥

विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ भरत अपने सुन्दर मुख वस्त्रसे ढककर अपने कण्ठस्वरके साथ आँसू गिराकर मन-ही-मन अत्यन्त पीड़ित हो पृथ्वीपर पड़कर विलाप करने लगे॥ २१ ॥

देवपुल्य भरत शोकसे व्याकुल हो वनमें फरसेसे काटे गये साखूके तनेकी भाँति पृथ्वीपर पड़े थे, मतवाले हाथीके समान पुष्ट तथा चन्द्रमा या सूर्यके समान तेजस्वी अपने शोकाकुल पुत्रको इस तरह भूमिपर पड़ा देख माता कैकेयीने उन्हें उठाया और इस प्रकार कहा— ॥ २२-२३ ॥