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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

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इक्यावनवाँ सर्ग

शतानन्दके पूछनेपर विश्वामित्रका उन्हें श्रीरामके द्वारा अहल्याके उद्धारका समाचार बताना तथा शतानन्दद्वारा श्रीरामका अभिनन्दन करते हुए विश्वामित्रजीके पूर्वचरित्रका वर्णन

परम बुद्धिमान् विश्वामित्रजीकी वह बात सुनकर महातेजस्वी महातपस्वी शतानन्दजीके शरीरमें रोमाञ्च हो आया॥ १ ॥

वे गौतमके ज्येष्ठ पुत्र थे। तपस्यासे उनकी कान्ति प्रकाशित हो रही थी। वे श्रीरामचन्द्रजीके दर्शनमात्रसे ही बड़े विस्मित हुए॥ २ ॥

उन दोनों राजकुमारोंको सुखपूर्वक बैठे देख शतानन्दने मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्रजीसे पूछा— ॥ ३ ॥

‘मुनिप्रवर! मेरी यशस्विनी माता अहल्या बहुत दिनोंसे तपस्या कर रही थीं। क्या आपने राजकुमार श्रीरामको उनका दर्शन कराया?॥ ४ ॥

‘क्या मेरी महातेजस्विनी एवं यशस्विनी माता अहल्याने वनमें होनेवाले फल-फूल आदिसे समस्त देहधारियोंके लिये पूजनीय श्रीरामचन्द्रजीका पूजन (आदर-सत्कार) किया था?॥ ५ ॥

‘महातेजस्वी मुने! क्या आपने श्रीरामसे वह प्राचीन वृत्तान्त कहा था, जो मेरी माताके प्रति देवराज इन्द्रद्वारा किये गये छल-कपट एवं दुराचारद्वारा घटित हुआ था?॥

‘मुनिश्रेष्ठ कौशिक! आपका कल्याण हो। क्या श्रीरामचन्द्रजीके दर्शन आदिके प्रभावसे मेरी माता शापमुक्त हो पिताजीसे जा मिलीं?॥ ७ ॥

‘कुशिकनन्दन! क्या मेरे पिताने श्रीरामका पूजन किया था? क्या उन महात्माकी पूजा ग्रहण करके ये महातेजस्वी श्रीराम यहाँ पधारे हैं?॥ ८ ॥

‘विश्वामित्रजी! क्या यहाँ आकर मेरे माता-पिताद्वारा सम्मानित हुए श्रीरामने मेरे पूज्य पिताका शान्त चित्तसे अभिवादन किया था?’॥ ९ ॥

शतानन्दका यह प्रश्न सुनकर बोलनेकी कला जाननेवाले महामुनि विश्वामित्रने बातचीत करनेमें कुशल शतानन्दको इस प्रकार उत्तर दिया—॥ १० ॥

‘मुनिश्रेष्ठ! मैंने कुछ उठा नहीं रखा है। मेरा जो कर्तव्य था, उसे मैंने पूरा किया। महर्षि गौतमसे उनकी पत्नी अहल्या उसी प्रकार जा मिली हैं, जैसे भृगुवंशी जमदग्निसे रेणुका मिली