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सर्वकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

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पृष्ठ 2459

‘उन दुर्वासा मुनिके चुप हो जानेपर महाराज दशरथ भी दोनों महात्माओंको प्रणाम करके फिर अपने उत्तम नगरमें लौट आये॥ २५ ॥

‘इस प्रकार पूर्वकालसे दुर्वासा मुनिकी कही हुई ये सब बातें मैंने वहाँ सुनीं और अपने हृदयमें धारण कर लीं (उन्हें किसीपर प्रकट नहीं किया)। वे बातें असत्य नहीं होंगी॥ २६ ॥

‘जैसा दुर्वासा मुनिका वचन है, उसके अनुसार श्रीरघुनाथजी सीताके दोनों पुत्रोंका अयोध्यासे बाहर अभिषेक करेंगे, अयोध्यामें नहीं॥ २७ ॥

‘नरश्रेष्ठ रघुनन्दन! विधाताका ऐसा ही विधान होनेके कारण आपको सीता तथा रघुनाथजीके लिये संताप नहीं करना चाहिये। आप धैर्य धारण करें’ ॥ २८ ॥

सूत सुमन्त्रके मुखसे यह अत्यन्त अद्भुत बात सुनकर लक्ष्मणको अनुपम हर्ष प्राप्त हुआ। वे बोले— ‘बहुत ठीक, बहुत ठीक’ ॥ २९ ॥

मार्गमें सुमन्त्र और लक्ष्मण इस प्रकारकी बातें कर ही रहे थे कि सूर्य अस्ताचलको चले गये। तब उन दोनोंने केशिनी नदीके तटपर रात बितायी॥ ३० ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें इक्यावनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५१॥