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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

पृष्ठ 1783, कुल 2621 में से

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पृष्ठ 1783

‘आपके भार्इ राक्षसशिरोमणि विभीषण भी लङ्कापुरीका राज्य लेकर श्रीरघुनाथजीके ही हितसाधनमें तत्पर रहते हैं॥ ३४ ॥

‘इस प्रकार मैंने सुवेल पर्वतपर ठहरी हुर्इ वानरसेनाका पूरा-पूरा वर्णन कर दिया। अब जो शेष कार्य है, वह आपके ही हाथ है’*॥ ३५ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥
३० ॥


* इस सर्गमें जो वानरोंके जन्मका वर्णन किया गया है, वह प्रायः बालकाण्डके सत्रहवें सर्गमें किये गये वर्णनसे विरुद्ध है। वहाँ वरुणसे सुषेण, पर्जन्यसे शरभ और कुबेरसे गन्धमादनकी उत्पत्ति कही गयी है। परंतु इस सर्गमें सुषेणको धर्मका तथा शरभ और गन्धमादनको वैवस्वत यमका पुत्र कहा गया है। इस विरोधका परिहार यही है कि यहाँ कहे गये सुषेण आदि बालकाण्डवर्णित सुषेण आदिसे भिन्न हैं।

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण · पृष्ठ 1783, कुल 2621 में से · SarvaKosh