सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

पृष्ठ 1622, कुल 2621 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1622

‘तुम भी श्रीरामचन्द्रजीके ही राज्यमें रहती हो, इसलिये तुम्हें उनकी सहायता करनी चाहिये। अथवा मैं मिथिलेशकुमारी सीता तथा अनायास ही महान् कर्म करनेवाले श्रीरामचन्द्रजीका दर्शन करके तुम्हारे मुखमें आ जाऊँगा, यह तुमसे सच्ची प्रतिज्ञा करके कहता हूँ’॥ २७१/२ ॥

‘मेरे ऐसा कहनेपर इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली सुरसा बोली— ‘मुझे यह वर मिला हुआ है कि मेरे आहारके रूपमें निकट आया हुआ कोई भी प्राणी मुझे टालकर आगे नहीं जा सकता’॥ २८१/२ ॥

‘जब सुरसाने ऐसा कहा—उस समय मेरा शरीर दस योजन बड़ा था, किंतु एक ही क्षणमें मैं उससे ड्योढ़ा बड़ा हो गया। तब सुरसाने भी अपने मुँहको मेरे शरीरकी अपेक्षा अधिक फैला लिया॥ २९-३० ॥

‘उसके फैले हुए मुँहको देखकर मैंने फिर अपने स्वरूपको छोटा कर लिया। उसी मुहूर्तमें मेरा शरीर अँगूठेके बराबर हो गया॥ ३१ ॥

‘फिर तो मैं सुरसाके मुँहमें शीघ्र ही घुस गया और तत्क्षण बाहर निकल आया। उस समय सुरसा देवीने अपने दिव्य रूपमें स्थित होकर मुझसे कहा— ‘सौम्य! कपिश्रेष्ठ! अब तुम कार्यसिद्धिके लिये सुखपूर्वक यात्रा करो और विदेहनन्दिनी सीताको महात्मा रघुनाथजीसे मिलाओ॥ ३३ ॥

‘महाबाहु वानर! तुम सुखी रहो। मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ।’ उस समय सभी प्राणियोंने ‘साधु-साधु’ कहकर मेरी भूरि-भूरि प्रशंसा की॥ ३४ ॥

‘तत्पश्चात् मैं गरुड़की भाँति उस विशाल आकाशमें फिर उड़ने लगा। उस समय किसीने मेरी परछाईं पकड़ ली, किंतु मैं किसीको देख नहीं पाता था॥ ३५ ॥

‘छाया पकड़ी जानेसे मेरा वेग अवरुद्ध हो गया, अतः मैं दसों दिशाओंकी ओर देखने लगा; परंतु जिसने मेरी गति रोक दी थी, ऐसा कोई प्राणी मुझे वहाँ नहीं दिखायी दिया॥ ३६ ॥

‘तब मेरे मनमें यह चिन्ता हुई कि मेरी यात्रामें ऐसा कौन-सा विघ्न पैदा हो गया, जिसका यहाँ रूप नहीं दिखायी दे रहा है॥ ३७ ॥

‘इसी सोचमें पड़े-पड़े मैंने जब नीचेकी ओर दृष्टि डाली, तब मुझे एक भयानक राक्षसी दिखायी दी, जो जलमें निवास करती थी॥ ३८ ॥