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सर्वकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

पृष्ठ 1256, कुल 2621 में से

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पृष्ठ 1256

‘वानरराज! जो पहले मित्रोंके द्वारा अपना कार्य सिद्ध करके बदलेमें उन मित्रोंका कोई
उपकार नहीं करता है, वह कृतघ्न एवं सब प्राणियोंके लिये वध्य है॥ १०॥

‘कपिराज! किसी कृतघ्नको देखकर कुपित हुए ब्रह्माजीने सब लोगोंके लिये आदरणीय
यह एक श्लोक कहा है, इसे सुनो—॥ ११॥

‘गोहत्यारे, शराबी, चोर और व्रत-भंग करनेवाले पुरुषके लिये सत्पुरुषोंने प्रायश्चित्तका
विधान किया है; किंतु कृतघ्नके उद्धारका कोई उपाय नहीं है॥ १२॥

‘वानर! तुम अनार्य, कृतघ्न और मिथ्यावादी हो; क्योंकि श्रीरामचन्द्रजीकी सहायतासे
तुमने पहले अपना काम तो बना लिया, किंतु जब उनके लिये सहायता करनेका अवसर आया,
तब तुम कुछ नहीं करते॥ १३॥

‘वानर! तुम्हारा मनोरथ सिद्ध हो चुका है; अतः अब तुम्हें प्रत्युपकारकी इच्छासे श्रीरामकी
पत्नी सीताकी खोजके लिये प्रयत्न करना चाहिये॥ १४॥

‘परंतु तुम्हारी दशा यह है कि अपनी प्रतिज्ञाको झूठी करके ग्राम्यभोगोंमें आसक्त हो रहे
हो। श्रीरामचन्द्रजी यह नहीं जानते हैं कि तुम मेढककी-सी बोली बोलनेवाले सर्प हो (जैसे साँप
अपने मुँहमें किसी मेढकको जब दबा लेता है, तब केवल मेढक ही बोलता है, दूरके लोग उसे
मेढक ही समझते हैं; परंतु वह वास्तवमें सर्प होता है। वही दशा तुम्हारी है। तुम्हारी बातें कुछ
और हैं और स्वरूप कुछ और)॥ १५॥

‘महाभाग श्रीरामचन्द्रजी परम महात्मा तथा दयासे द्रवित हो जानेवाले हैं; अतएव उन्होंने
तुम-जैसे पापी और दुरात्माको भी वानरोंके राज्यपर बिठा दिया॥ १६॥

‘यदि तुम महात्मा रघुनाथजीके किये हुए उपकारको नहीं समझोगे तो शीघ्र ही उनके
तीखे बाणोंसे मारे जाकर वालीका दर्शन करोगे॥ १७॥

‘सुग्रीव! वाली मारा जाकर जिस रास्तेसे गया है, वह आज भी बंद नहीं हुआ है। इसलिये
तुम अपनी प्रतिज्ञापर डटे रहो। वालीके मार्गका अनुसरण न करो॥

‘इक्ष्वाकुवंशशिरोमणि श्रीरामचन्द्रजीके धनुषसे छूटे हुए उन वज्रतुल्य बाणोंकी ओर
निश्चय ही तुम्हारी दृष्टि नहीं जा रही है। इसीलिये तुम ग्राम्यसुखका सेवन कर रहे हो और उसीमें
सुख मानकर श्रीरामचन्द्रजीके कार्यका मनसे भी विचार नहीं करते हो’॥ १९॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें चौंतीसवाँ सर्ग
पूरा हुआ॥ ३४॥