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सर्वकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

पृष्ठ 1044, कुल 2621 में से

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पृष्ठ 1044

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इकसठवाँ सर्ग

श्रीराम और लक्ष्मणके द्वारा सीताकी खोज और उनके न मिलनेसे श्रीरामकी व्याकुलता

दशरथनन्दन श्रीरामने देखा कि आश्रमके सभी स्थान सीतासे सूने हैं तथा पर्णशालामें भी सीता नहीं हैं और बैठनेके आसन इधर-उधर फेंके पड़े हैं। तब उन्होंने पुनः वहाँके सभी स्थानोंका निरीक्षण किया और चारों ओर ढूँढ़नेपर भी जब विदेहकुमारीका कहीं पता नहीं लगा, तब श्रीरामचन्द्रजी अपनी दोनों सुन्दर भुजाएँ ऊपर उठाकर सीताका नाम ले जोर-जोरसे पुकार करके लक्ष्मणसे बोले— ॥ १-२ ॥

‘भैया लक्ष्मण! विदेहराजकुमारी कहाँ हैं? यहाँसे किस देशमें चली गयीं? सुमित्रानन्दन! मेरी प्रिया सीताको कौन हर ले गया? अथवा किस राक्षसने खा डाला?॥ ३ ॥

(फिर वे सीताको सम्बोधित करके बोले—) ‘सीते! यदि तुम वृक्षोंकी आड़में अपनेको छिपाकर मुझसे हँसी करना चाहती हो तो इस समय यह हँसी ठीक नहीं है। मैं बहुत दुःखी हो रहा हूँ, तुम मेरे पास आ जाओ॥ ४ ॥

‘सौम्य स्वभाववाली सीते! जिन विश्वस्त मृगछौनोंके साथ तुम खेला करती थी, वे आज तुम्हारे बिना दुःखी हो आँखोंमें आँसू भरकर चिन्तामग्न हो गये हैं’॥ ५ ॥

‘लक्ष्मण! सीतासे रहित होकर मैं जीवित नहीं रह सकता। सीताहरणजनित महान् शोकने मुझे चारों ओरसे घेर लिया है। निश्चय ही अब परलोकमें मेरे पिता महाराज दशरथ मुझे देखेंगे॥ ६ १/२ ॥

वे मुझे उपालम्भ देते हुए कहेंगे— ‘मैंने तो तुम्हें वनवासके लिये आज्ञा दी थी और तुमने भी वहाँ रहनेकी प्रतिज्ञा कर ली थी। फिर उतने समयतक वहाँ रहकर उस प्रतिज्ञाको पूर्ण किये बिना ही तुम यहाँ मेरे पास कैसे चले आये?॥ ७ १/२ ॥

‘तुम-जैसे स्वेच्छाचारी, अनार्य और मिथ्यावादीको धिक्कार है। यह बात परलोकमें पिताजी मुझसे अवश्य कहेंगे’॥ ८ १/२ ॥

‘वरारोहे! सुमध्यमे! सीते! मैं विवश, शोकसंतप्त, दीन, भग्नमनोरथ हो करुणाजनक अवस्थामें पड़ गया हूँ। जैसे कुटिल मनुष्यको कीर्ति त्याग देती है, उसी प्रकार तुम मुझे यहाँ छोड़कर कहाँ चली जा रही हो? मुझे न छोड़ो, न छोड़ो॥ ९-१० ॥