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सर्वकोश
श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

पृष्ठ 1037, कुल 2621 में से

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पृष्ठ 1037

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उनसठवाँ सर्ग

श्रीराम और लक्ष्मणकी बातचीत

(आश्रममें आनेसे पहले मार्गमें श्रीराम और लक्ष्मणने परस्पर जो बातें की थीं, उन्हें पुनः विस्तारके साथ बता रहे हैं—) सीताके कथनानुसार आश्रमसे अपने पास आये हुए सुमित्राकुमार लक्ष्मणसे मार्गमें भी रघुकुलनन्दन श्रीरामने बड़े दुःखसे यह बात पूछी—॥ १ ॥

‘लक्ष्मण! जब मैंने तुम्हारे विश्वासपर ही वनमें सीताको छोड़ा था, तब तुम उसे अकेली छोड़कर क्यों चले आये?॥ २ ॥

‘लक्ष्मण! मिथिलेशकुमारीको छोड़कर तुम जो मेरे पास आये हो, तुम्हें देखते ही जिस महान् अनिष्टकी आशङ्का करके मेरा मन व्यथित हो रहा था, वह सत्य जान पड़ने लगा है॥ ३ ॥

‘लक्ष्मण! मेरी बायीं आँख और बायीं भुजा फड़क रही है। तुम्हें आश्रमसे दूर सीताके बिना ही मार्गपर आते देख मेरा हृदय भी धक-धक कर रहा है’॥ ४ ॥

श्रीरामचन्द्रजीके ऐसा कहनेपर उत्तम लक्षणोंसे सम्पन्न सुमित्राकुमार लक्ष्मण अत्यन्त दुःखी होकर अपने शोकग्रस्त भाई श्रीरामसे बोले—॥ ५ ॥

‘भैया! मैं स्वयं अपनी इच्छासे उन्हें छोड़कर नहीं आया हूँ। उन्हींके कठोर वचनोंसे प्रेरित होकर मुझे आपके पास आना पड़ा है॥ ६ ॥

‘आपके ही समान स्वरमें किसीने जोरसे पुकारा, ‘लक्ष्मण! मुझे बचाओ।’ यह वाक्य मिथिलेशकुमारीके कानोंमें भी पड़ा॥ ७ ॥

‘उस आर्तनादको सुनकर मैथिली आपके प्रति स्नेहके कारण भयसे व्याकुल हो गयीं और रोती हुई मुझसे तुरंत बोलीं— ‘जाओ, जाओ’॥ ८ ॥

‘जब बारंबार उन्होंने ‘जाओ’ कहकर मुझे प्रेरित किया, तब उन्हें विश्वास दिलाते हुए मैंने मैथिलीसे यह बात कही—॥ ९ ॥

‘देवि! मैं ऐसे किसी राक्षसको नहीं देखता, जो भगवान् श्रीरामको भी भयमें डाल सके। आप शान्त रहें, यह भैयाकी आवाज नहीं है। किसी दूसरेने इस तरहकी पुकार की है॥ १० ॥

‘सीते! जो देवताओंकी भी रक्षा कर सकते हैं, वे मेरे बड़े भाई ‘मुझे बचाओ’ ऐसा निन्दित (कायरतापूर्ण) वचन कैसे कहेंगे?॥ ११ ॥