श्रीमद्भागवत महापुराण
Shrimad Bhagavata Mahapurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
।। श्रीहरिः ।।
श्रीमद्भागवतकी आरती
आरति अतिपावन पुरानकी ।
धर्म-भक्ति-विज्ञान-खानकी ।।टेक।।
महापुरान भागवत निरमल ।
शुक-मुख-विगलित निगम-कल्प-फल ।
परमानन्द-सुधा-रसमय कल ।
लीला-रति-रस रसनिधानकी ।।आरति०।।
कलि-मल-मथनि त्रिताप-निवारिनि ।
जन्म-मृत्युमय भव-भय-हारिनि ।
सेवत सतत सकल सुख-कारिनि ।
सुमहौषधि हरि-चरित-गानकी ।।आरति०।।
विषय-विलास-विमोह-विनाशिनि ।
विमल विराग विवेक विकाशिनि ।
भगवत्-तत्त्व-रहस्य-प्रकाशिनि ।
परम ज्योति परमात्म-ज्ञानकी ।।आरति०।।
परमहंस-मुनि-मन उल्लासिनि ।
रसिक-हृदय रस-रास विलासिनि ।
भुक्ति मुक्ति रति प्रेम सुदासिनि ।
कथा अकिञ्चनप्रिय सुजानकी ।।आरति०।।
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गीताप्रेस, गोरखपुर
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गीताप्रेस, गोरखपुर
महाप्रयाणके समय भीष्मपर भगवान्की कृपा
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गीताप्रेस, गोरखपुर
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गीताप्रेस, गोरखपुर
B. K. Mitra
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गीताप्रेस, गोरखपुर
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गीताप्रेस, गोरखपुर
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नवधा भक्ति
- श्रवण
- कीर्तन
- स्मरण
- पादसेवन
- अर्चन
- वन्दन
- दास्य
- सख्य
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भक्तिदेवी
गीताप्रेस, गोरखपुर
B. K. Mitra
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