सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
श्रीमद्भागवत महापुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

Shrimad Bhagavata Mahapurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,617 पृष्ठ

पृष्ठ 397, कुल 1617 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 397

कुत्र कौषारवेस्तस्य संवादोऽध्यात्मसंश्रितः ।
यद्वा स भगवांस्तस्मै पृष्टस्तत्त्वमुवाच ह ॥४९

ब्रूहि नस्तदिदं सौम्य विदुरस्य विचेष्टितम् ।
बन्धुत्यागनिमित्तं च तथैवागतवान् पुनः ॥५०

सूत उवाच

राज्ञा परीक्षिता पृष्टो यदवोचन्महामुनिः ।
तद्वोऽभिधास्ये शृणुत राज्ञः प्रश्नानुसारतः ॥५१

उस यात्रामें मैत्रेय ऋषिके साथ अध्यात्मके सम्बन्धमें उनकी बातचीत कहाँ हुई तथा मैत्रेयजीने उनके प्रश्न करनेपर किस तत्त्वका उपदेश किया? ॥४९॥ सूतजी! आपका स्वभाव बड़ा सौम्य है। आप विदुरजीका वह चरित्र हमें सुनाइये। उन्होंने अपने भाई-बन्धुओंको क्यों छोड़ा और फिर उनके पास क्यों लौट आये? ॥५०॥

सूतजीने कहा—शौनकादि ऋषियो! राजा परीक्षित्ने भी यही बात पूछी थी। उनके प्रश्नोंके उत्तरमें श्रीशुकदेवजी महाराजने जो कुछ कहा था, वही मैं आपलोगोंसे कहता हूँ। सावधान होकर सुनिये ॥५१॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे वैयासिक्यामष्टादशसाहस्र्यां पारमहंस्यां संहितायां द्वितीयस्कन्धे पुरुषसंस्थानुवर्णनं नाम दशमोऽध्यायः ॥१०॥


॥ इति द्वितीयः स्कन्धः समाप्तः ॥

ॐ ॐ ॐ


१. प्रा० पा०—नुवर्णितम्। २. प्रा० पा०—तपस्तद् यत्र गीयते। ३. प्रा० पा०—जप्यते।
१. प्रा० पा०—स स्मृतो। २. प्रा० पा०—विसर्गतः। ३. प्रा० पा०—तेजस्ततः।
१. प्रा० पा०—विभोः। २. प्रा० पा०—सुचिरं तस्य। ३. प्रा० पा०—अक्षिणी। ४. प्रा० पा०—बलवानिन्द्र आदा०।
१. प्रा० पा०—त्रिभिः। २. प्रा० पा०—मनश्चन्द्र इति। ३. प्रा० पा०—भूतात्म०।
१. प्रा० पा०—मातृरक्षः०। २. प्रा० पा०—कुशलाकुशलमिश्राणां।
१. प्रा० पा०—सुरादिभिः। २. प्रा० पा०—तत्काले। ३. प्रा० पा०—कल्पमिमं। ४. प्रा० पा०—कृत्स्नं च दुस्त्यजम्।

ebook converter DEMO Watermarks*