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श्री भक्तमाल (नाभादास जी कृत - प्रियादास जी टीका सहित)

Shri Bhaktamal of Nabhadas with Priyadas Commentary

गोस्वामी नाभादास जी / प्रियादास जी द्वारा

DevanagariHindipublished195 पृष्ठ

छन्द-प्रमाणिका
•═════नमामि भक्तमाल को═════•
पढ़ै जो आदि अन्त लौ बढ़ै जो पर्म तन्त लौं। दहैं अनन्त साल को नमामि भक्तमाल को।। १।।
कथा करै जो याहि की व्यथा रहै न ताहि की। मिलै सो रामलाल को नमामि भक्तमाल को।। २।।
प्रकार नौ कि भक्ति जो सो अंग होत शक्ति सौं। कहै गिरा रसाल को नमामि भक्तमाल को।। ३।।
गहै अनन्य भाव है लहै सुभक्ति भाव है। यही प्रमाण भाल को नमामि भक्तमाल को।। ४।।
अभक्त भक्ति को लहै न भूलि मुक्ति को चहै। गनै सो तुच्छ काल को नमामि भक्तमाल को।। ५।।
करैं जो पाठ प्रात में सरै सुकाज गात में। हरैहि कर्मजाल को नमामि भक्तमाल को।। ६।।
मिलाय दुग्ध तक्र ते जु होत सर्पि चक्र ते। तथा सुबुद्धि बाल को नमामि भक्तमाल को।। ७।।
बहूपमा कहौं कहा कहे न पार को लहा। बखान सूर्य ख्याल को नमामि भक्तमाल को।। ८।।
•═════ श्रीनाभाजी की प्रार्थना ═════•
बातन ही हौ पतितपावन।
मोते काम परे जानहुगे बिन रन सूर कहावन।।
सतयुग त्रेता द्वापर हू के पतितन को गति आपी।
उन्हे हमें बहुतै अन्तर है हम कलियुग के पापी।।
कोउ टाँक द्वै टाँक पौसेरा बड़ी बड़ाई सेर।
हौं पूरन पतिताई ऐसो ज्यौं पाषाननि मेर।।
है दिन मनि खद्योत आन खल अविद्या को जु उजागर।
गोपद पावन के न सरवरै हौं दुरमति जल सागर।।
पतितपावन है विरद् तिहारो सोइ करौ परमान।
पाहन नाव पार करौ "नाभा" के हरि पकरौ कान।।
•═══•

॥श्रीभक्तमालजी की आरती॥
इस धन्य नाभा भारती की,
आरती आरती हरै।
यह भक्त भगवत् की कथा,
सब विश्व का मंगल करै॥
नर जाति जब माया विवश,
अज्ञान तम में पग गई।
जन भारती आभा तभी,
जग जग गई जग मग गई॥
अज्ञान माया मोह तम की,
कालिमा कलई धुली।
सप्रेम समता सत्य सुख शुचि,
कंज कलिकायें खिलीं॥
उल्लूक खल कलिमल सकल,
उड़गन प्रभाहत हो गये।
तब सब पथिक सुन्दर सुखद,
हरिभक्ति पथ को पा गये॥
इस भक्त माला के सकल,
हरि भक्तजन दाया करो।
सच्ची अहिंसा भक्तिमय,
विज्ञान दै माया हरो॥