शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
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टीका-ऐसे पूर्वोक्त अभ्यासमें जो लोग तत्परहैं उन-
को सर्व सिद्धि उत्पन्न होती है. इस हेतुसे यत्न करके
योगी आत्माके सिद्धहोनेकी साधना करे ॥ ११६ ॥
मूलम्-गोपनीयं प्रयत्नेन न देयं यस्यकस्य
चित् ॥ येन शीघ्रं मरुत्सिद्धिर्भवेद्दुःखौ-
घनाशिनी ॥ ११७ ॥
टीका-यह आसन जो पहिले कहा है यत्नसे गोप-
नीयहै सबको देना उचित नहीं है परंतु अधिकारीको
देना योग्यहै इससे बहुत शीघ्र वायु सिद्ध होजाताहै
और यह सिद्धि दुःखके समूहको नाश करने-
वाली है ॥ ११७ ॥
मूलम्-जानूर्वोरन्तरे सम्यग्धृत्वा पादतले
उभे ॥ समकायः सुखासीनः स्वस्तिकं
तत्प्रचक्षते ॥ ११८ ॥ अनेन विधिना यो-
गी मारुतं साधयेत्सुधीः ॥ देहे न क्रमते
व्याधिस्तस्य वायुश्च सिध्यति ॥ ११९ ॥
सुखासनमिदं प्रोक्तं सर्वदुःखप्रणाशनम् ॥
स्वस्तिकं योगिभिर्गोप्यं स्वस्तीकरण-
मुत्तमम् ॥ १२० ॥
टीका-जानु और ऊरुके मध्यमें बराबर पादको