शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
पृष्ठ 91, कुल 216 में से
संदर्भ में पढ़ेंतृतीयपटलः । (८७)
टीका-दोनों चरणोंको उत्तान करके यत्नसे ऊरू
अर्थात् जंघापर रक्खे उसीप्रकार दोनों हाथको सीधा
करके ऊरुके मध्यमें रक्खे और नासिकाके अग्रभागमें
दृष्टि और दांतके मूलमें जिह्वा स्थितकरे और वक्ष अर्था-
त् हृदयस्थानपर चिबुक अर्थात् ठोडी स्थापन करे और
अपानवायुको उठाके प्राणको शनैःशनैः यथाशक्ति पूरक
करके धारणाकरे पश्चात् धीरे धीरे रेचक अर्थात् वायुको
त्यागदे इसको पद्मासन कहतेहैं यह सर्व व्याधिका ना-
शक है यह आसन बहुत दुर्लभहै परंतु कोई बुद्धिमान्
साधकको प्राप्त होताहै ॥१०७॥१०८॥१०९॥११०॥
मूलम्-अनुष्ठाने कृते प्राणः समश्चलति त-
त्क्षणात् ॥ भवेदभ्यासने सम्यक्साध-
कस्य न संशयः ॥ १११ ॥
टीका-पूर्वोक्त अनुष्ठान करनेसे उसी समय प्राण
सम होके सुषुम्णामें प्रवेश करेगा अभ्याससे साधक-
का वायु सम होजायगा इसमें संशय नहीं ॥ १११ ॥
मूलम्-पद्मासने स्थितो योगी प्राणापान
विधानतः ॥ पूरयेत्स विमुक्तः स्यात्सत्यं
सत्यं वदाम्यहम् ॥ ११२ ॥
टीका-ईश्वर श्रीपार्वतीजीसे कहते हैं कि पद्मासन-