शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
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अष्टसिद्धिका लाभ होय और सर्व भूतगण आपही वश
में होजाय ॥ ९२ ॥ ९३ ॥ ९४ ॥
मूलम्-रसनामूर्ध्वगां कृत्वा क्षणार्धं यदि
तिष्ठति ॥ क्षणेन मुच्यते योगी व्याधिमृ-
त्युजरादिभिः ॥ ९५ ॥
टीका-योगीकी जिह्वा यदि क्षणमात्र उपर स्थिर
होजाय तो उसी क्षणसे सर्वव्याधि और वृद्धावस्था और
मृत्युका नाश होजाय. तात्पर्य यह है कि, खेचरीमुद्रासे
किंचित्मात्र भी अमृतपान करलेगा तो उसकी मृत्यु
न होगी ॥ ९५ ॥
मूलम्--रसनां प्राणसंयुक्तां पीड्यमानां वि-
चिंतयेत् ॥ न तस्य जायते मृत्युः सत्यं
सत्यं मयोदितम् ॥ ९६ ॥
टीका-जिह्वाको प्राणसहित पीडित करके जो पुरुष
ब्रह्मरन्ध्रमें ध्यानसंयुक्त स्थिर करेगा. हेदेवी ! हम वारं-
वार कहतेहैं कि, निश्चय उसकी मृत्यु न होगी ॥ ९६ ॥
मूलम्-एवमभ्यासयोगेन कामदेवो द्विती-
यकः ॥ न क्षुधा न तृषा निद्रा नैव मूर्च्छा
प्रजायते ॥ ९७ ॥
टीका-इस योगअभ्याससे जो पहिले कहाहै वह