शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयपटलः । (८१)
पिबेत् ॥ ध्यात्वा कुण्डलिनीं देवीं षण्मा-
सेन कविर्भवेत् ॥ ८८ ॥
टीका-जो साधक राजदन्तको नीचेके दांतसे द-
बायके उसके रन्ध्रद्वारा विधिसे वायुपान करे और उस
कालमें कुण्डलिनी देवीका ध्यान करेगा तो निश्चय छः
मासमें कवि होगा ॥ ८८ ॥
मूलम्-काकचंच्वा पिबेद्वायुं सन्ध्ययोरुभ-
योरपि ॥ कुण्डलिन्या मुखे ध्यात्वा
क्षयरोगस्य शान्तये ॥ ८९ ॥
टीका-पूर्वोक्त काकचञ्चूसे विधिसे दोनों सन्ध्यामें
जो कुण्डलिनीकी मुखका ध्यान करके वायुपान करे-
गा उसका क्षयरोग नाश होजायगा ॥ ८९ ॥
मूलम्-अहर्निशं पिबेद्योगी काकचंच्वा वि-
चक्षणः ॥ पिबेत्प्राणानिलं तस्य रोगाणां
संक्षयो भवेत् ॥ दूरश्रुतिर्दूरदृष्टिस्तथा
स्याद्दर्शनं खलु ॥ ९० ॥
टीका-जो योगी बुद्धिमान् रात्रि दिवस काकच-
ञ्चूसे प्राणवायु पान करतेहैं उनके रोगोंका नाश हो-
जाताहै और दूरका शब्द श्रवण होताहै और दूरकी व-
स्तु देख पडती है तथा निश्चय सूक्ष्म दर्शन होताहै॥९०॥