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सर्वकोश
शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

Shiva Samhita with Hindi Commentary

भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished216 पृष्ठ

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पृष्ठ 83

तृतीयपटलः। ( ७९ )
टीका-जब अपने अभ्यासकर्मसे योगीको समाधी-
का ज्ञान होगा तब जीवन्मुक्त शान्त होके योगीको
ज्ञानसम्पन्न स्वेच्छासमाधी होगी और मन वायु क्रिया-
शक्तिसहित सर्व चक्रोंको वेधके ज्ञानशक्तीमें लीन हो-
जायगा ॥ ८० ॥ ८१ ॥ ८२ ॥
मूलम्-इदानीं क्लेशहान्यर्थं वक्तव्यं वायु-
साधनम् ॥ येन संसारचक्रेस्मिन्न्रोगहा-
निर्भवेद्ध्रुवम् ॥ ८३ ॥
टीका-हे देवि ! अब क्लेशहानीके अर्थ वायुसाधन
कहते हैं जिससे इस संसारचक्रमें निश्चय रोगादिक
नाश होजाय और साधकको कष्ट न हो ॥ ८३ ॥
मूलम्-रसनां तालुमूले यः स्थापयित्वा
विचक्षणः॥ पिबेत्प्राणानिलं तस्य रोगाणां
संक्षयो भवेत् ॥ ८४ ॥ .
टीका-जिह्वाको तालुके मूलमें स्थितकरके बुद्धि-
मान साधक यदि प्राणवायुको पान करे तो उसके सर्व
रोगोंका नाश होजायगा ॥ ८४ ॥
मूलम्-काकचंच्वा पिबेद्वायुं शीतलं यो वि-
चक्षणः ॥ प्राणापानविधानज्ञः स भवे-
न्मुक्तिभाजनः ॥ ८५ ॥