शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
पृष्ठ 62, कुल 216 में से
संदर्भ में पढ़ें( ५८ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता ।
टीका-गुरुको सब तरहसे प्रसन्न करके जो विद्या
मिलतीहै उस विद्याका फल शीघ्र होताहै अर्थात् थोडे
कालमें सिद्ध होजातीहै ॥ १२ ॥
मूलम्--गुरुः पितागुरुर्माता गुरुर्देवो नसंश-
यः ॥ कर्मणा मनसा वाचा तस्मात्सर्वैः
प्रसेव्यते ॥१३॥ गुरुप्रसादतः सर्वं लभ्य-
ते शुभमात्मनः ॥ तस्मात्सेव्यो गुरुर्नि-
त्यमन्यथा न शुभं भवेत् ॥ १४॥ प्रदक्षि-
णत्रयं कृत्वा स्पृष्ट्वा सव्येन पाणिना ॥
अष्टांगेननमस्कुर्याद्गुरुपादसरोरुहम् ॥१५॥
टीका-गुरु पिता और गुरु माता और गुरु देवता है
इसमें संशय नहीं है इस हेतुसे गुरुको कर्मसे मनसे
वाक्यसे सब प्रकारसे सेवा करना उचितहै गुरुके प्र-
सादसे आत्माका सब शुभ होजाता है इसलिये गुरु-
की नित्य सेवा करना उचित है दूसरी तरह शुभ नहीं
है गुरुको तीन प्रदक्षिणा करके दक्षिण हाथसे स्पर्श
करके गुरुके चरणकमलमें साष्टांग नमस्कार करना
उचित है ॥ १३ ॥ १४ ॥ १५ ॥
मूलम्-श्रद्धयात्मवतां पुंसां सिद्धिर्भवति
नान्यथा ॥ अन्यथाश्च न सिद्धिः स्यात्त-
स्माद्यत्नेन साधयेत् ॥ १६ ॥