शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयपटलः । ( ५१ )
ताहै वही साक्षात् भ्रमका कारणहै अर्थात् इसी साक्षा-
त्में मनुष्य फँसाहै मायाके आवरणसे बुद्धि आगे
नहीं जाती और दूसरा कारण कुछ नहीं है यह हम
सत्य कहते हैं ॥ ४८ ॥
मूलम्-साक्षात्कारिभ्रमे साक्षात्साक्षा-
त्कारिणि नाशयेत् ॥ सो हि नास्तीति
संसारे भ्रमो नैव निवर्तते ॥ ४९ ॥
टीका-यह साक्षात् घटपट आदिका भ्रम ब्रह्मके
प्रत्यक्ष होनेसे नाश होताहै बिना आत्माके प्रत्यक्ष भये
ब्रह्म संसारमें नहीं है यह भ्रम निवृत्त नहीं होता ॥ ४९ ॥
मूलम्-मिथ्याज्ञाननिवृत्तिस्तु विशेषदर्शना-
द्भवेत् ॥ अन्यथा न निवृत्तिः स्याद्दृश्य-
ते रजतभ्रमः ॥ ५० ॥
टीका-यह मिथ्या संसारका ज्ञान आत्माका विशे-
ष दर्शन होनेसे निवृत्त होता है और किसीप्रकार इस
अज्ञानकी निवृत्ति नहीं होती. जैसे सीपीमें चाँदीका
भ्रम विना सीपीके निश्चय भये दूर नहीं होता ॥ ५० ॥
मूलम्-यावन्नोत्पद्यते ज्ञानं साक्षात्कारे
निरञ्जने ॥ तावत्सर्वाणि भूतानि दृश्य-
न्ते विविधानि च ॥ ५१ ॥