शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमपटलः । (३५)
मूलम्-तत्पञ्चीकरणात्स्थूलान्यसंख्यानि
चराचरम् ॥ ब्रह्मांडस्थानि वस्तूनि यत्र
जीवोऽस्तिकर्मभिः ॥ १०१ ॥ तद्भूतपञ्च-
कात्सर्व भोगाय जीवसंज्ञिता ॥ १०२ ॥
टीका-उसी पंचीकरणसे अनेक स्थूल वस्तु इस
संसारमें चराचर उत्पन्न होती हैं यह जीवभी अपने
कर्मके अनुसार भोग भोगनेके हेतु उसी पांच भूतसे
जीवसंज्ञा करके प्रगट होता है ॥ १०१ ॥ १०२ ॥
मूलम्--पूर्वकर्मानुरोधेन करोमि घटनामहं॥
अजडः सर्वभूतान्वै जडस्थित्या भुनक्ति
तान् ॥ १०३ ॥
टीका-ईश्वर कहते हैं कि, प्राणीको पूर्व कर्मके अनु-
सार हम उत्पन्न करतेहैं और सर्व, भूतोंसे हम अजड
अर्थात् भिन्न और अविनाशी हैं परंतु जडरूप होके सब-
को हम खाजाते हैं अर्थात् सबका नाश करतेहैं ॥१०३॥
मूलम्-जडात्स्वकर्मभिर्बद्धो जीवाख्यो वि-
विधो भवेत् ॥ भोगायोत्पद्यते कर्म ब्रह्मां-
डाख्ये पुनः पुनः॥ जीवश्च लीयते भोगाव-
साने च स्वकर्मणः ॥ १०४ ॥