शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमपटलः । ( ३३ )
यः करोत्येव नित्यं मुक्तः स स्यान्मृत्युसं-
सारदुःखात् ॥ ९५ ॥
टीका-एक सत्तामात्र पूरित आनन्दस्वरूप परि-
पूर्ण व्यापी सर्वदा वर्तमानहै और दूसरा कुछ नहीं है
ऐसा ज्ञान जिसको है और सर्वदा वह यही मनन कर-
ताहै सो मुक्त है अर्थात् संसारके जन्ममरणआदि
दुःखसे वह रहित है ॥ ९५ ॥
मूलम्-यस्यारोपापवादाभ्यां यत्र सर्वे लयं
गताः॥ स एको वर्तते नान्यत्तच्चितेना-
वधार्यते ॥ ९६ ॥
टीका-जहां ज्ञानद्वारा संसारके कार्योंका लय
होजाता है अर्थात् उससे अभेद होजाते हैं उसी एक
सर्वदा वर्तमान आत्मामें मनको लय करे अर्थात्
आत्माकाही ध्यान धारण करे ॥९६॥
मूलम्-पितुरन्नमयात्कोशाज्जायते पूर्वक-
र्मणः ॥ शरीरं वै जडं दुःखं स्वप्राग्भोगाय
सुन्दरम् ॥ ९७ ॥
टीका-पूर्वकर्मके अनुसार प्राणी पिताके अन्न-
मय कोशसे दुःख भोगनेके कारण जड शरीर सुन्दर
भोमरूप उत्पन्न होताहै ॥ ९७॥