शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमपटलः । ( २७ )
संसार मनोराज्यवत् है. जैसे मनुष्यका मनोराज्य मि-
थ्या है, उसी प्रकार आत्माका इच्छाभूत यह जगत्भी
मिथ्याहै शुद्धब्रह्ममें ज्ञानरूपी विद्याका संबन्ध है ॥७५॥
मूलम्-ब्रह्मतेजोंऽशतो याति तत आभास
ते नभः ॥ तस्मात्प्रकाशते वायुर्वायोर-
ग्निस्ततो जलम् ॥ ७६ ॥ प्रकाशते ततः
पृथ्वी कल्पनेयं स्थिता सति ॥ आकाशा-
द्वायुराकाशपवनादग्निसंभवः ॥ ७७ ॥
टीका-उस ब्रह्मके तेजअंशसे आकाश उत्पन्नभया,
आकाशसे वायु उत्पन्न भया, वायुसे अग्नि उत्पन्न भया
अग्निसे जल भया, जलसे पृथ्बी उत्पन्न भई, यह कल्प-
ना है आकाशसे वायु उत्पन्न भया और आकाश
वायुसे तेज उत्पन्न भया ॥ ७६ ॥ ७७ ॥
मूलम्-खवाताग्नेर्जलं व्योमवाताग्निवारि
तोमही ॥ खंशब्दलक्षणं वायुश्चंचलः स्प-
र्शलक्षणः ॥ ७८ ॥ स्याद्रूपलक्षणं तेजः
सलिलं रसलक्षणम् ॥ गन्धलक्षणिका
पृथ्बी नान्यथा भवति ध्रुवम् ॥ ७९ ॥