सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

Shiva Samhita with Hindi Commentary

भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished216 पृष्ठ

पृष्ठ 21, कुल 216 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 21

प्रथमपटलः । ( १७ )
मूलम्-आगमाऽपायिनोऽनित्यानाश्यत्वेने-
श्वरादयः ॥ आत्मबोधेन केनापि शास्त्रा-
देतद्विनिश्चितम् ॥ ४६ ॥
टीका-वह शास्त्र जिसमें आत्मबोधका निरूपण
किया है उससे निश्चय है कि, इंद्रादि देवताभी जो ईश्वर
कहे जाते हैं नित्यभावसे रहित हैं अर्थात् उनकाभी
जनन मरण होताहै ॥ ४६ ॥
मूलम्-यथा वातवशात्सिन्धावुत्पन्नाः फेन-
बुद्बुदाः ॥ तथात्मनि समुद्भूतं संसारं
क्षणभंगुरम् ॥ ४७ ॥
टीका-जैसे वायुकी उपाधिसे समुद्रमें फेन और
बुद्बुदे उत्पन्न होते हैं क्षणभरमें फिर उसीमें लय हो-
जाते हैं तैसेही आत्मासे संसार मायाकी उपाधिसे क्षण-
भंगी उत्पन्न होताहै फिर उसीमें लय होजाताहै ॥ ४७ ॥
मूलम्-अभेदो भासते नित्यं वस्तुभेदो न
भासते ॥ द्विधात्रिधादिभेदोऽयं भ्रमत्वे
पर्यवस्यति ॥ ४८ ॥
टीका-परमात्माका संसारसे सदा अभेद है और
किसी वस्तुमें भेद नहीं है एक दो तीन ऐसा जो वस्तु
का भेद जानपड़ताहै वह भ्रमका कारण है ॥ ४८ ॥