शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २०२ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता ।
मेयमनामयम् ॥ लभतेऽसौ नसन्देहोधी-
मान्सर्वमभीप्सितम् ॥ २६० ॥
टीका-हे पार्वति ! त्रिपुरस्थानमें एक शिवही परम का-
रण स्वरूप हैं उनका चरणकमल अक्षय शान्त अप्रमेय
अर्थात् प्रमाणरहित अनामय अर्थात् रोगरहित है उनका
पद बुद्धिमान् योगीलोगही इच्छापूर्वक लाभ करते हैं
इसमें संदेह नहीं है ॥ २५९ ॥ २६० ॥
मूलम्-शिवविद्या महाविद्या गुप्ता चाग्रे महें-
श्वरी ॥ मद्भाषितमिदं शास्त्रं गोपनीयमतो
बुधैः ॥ २६१ ॥
टीका-हे महादेवि ! यह हमारी कहीहुई महाविद्या-
कोही शिवविद्या कहते हैं यह विद्या सर्वप्रकार गोपनीय
है इस योगशास्त्रको बुद्धिमान् लोग कदापि प्रकाश
नहीं करते हैं ॥ २६१ ॥
मूलम्-हठविद्या परं गोप्या योगिना सिद्धि-
मिच्छता ॥ भवेद्वीर्यवती गुप्ता निर्वीर्या
च प्रकाशिता ॥ २६२ ॥
टीका-सिद्धिकांक्षी योगीलोग इस हठविद्याको
अतिगोपित रक्खें यह गोप्य रखनेसे वीर्यवती रहतीहै
और प्रकाश करनेसे निर्वीर्या होजातीहै ॥ २६२ ॥