शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपंचमपटलः । ( १८९ )
मूलम्-एतद्ध्यानान्महासिद्धिर्भवत्येव न
संशयः ॥ वृत्तिहीनं मनः कृत्वा पूर्णरूपं
स्वयं भवेत् ॥ २१५ ॥
टीका-इसप्रकार ध्यान करनेसे महासिद्धि उत्पन्न
होगी इसमें संशय नहीं है ऐसेही मनको वृत्तिहीन करके
साधक आपही पूर्ण आत्मस्वरूप होजायगा ॥ २१५ ॥
मूलम्-साधयेत्सततं यो वै सयोगी विगत-
स्पृहः ॥ अहंनाम न कोप्यस्ति सर्वदा-
त्मैव विद्यते ॥ २१६ ॥
टीका-जो योगी निरन्तर इसप्रकार साधन करे
सो इच्छारहित है अर्थात् उसको किसी वस्तुकी इच्छा
न होगी और उसके वदनसे अहंशब्द कभी उच्चारण
न होगी वह सर्वदा सर्ववस्तुको आत्मस्वरूपही
देखेगा ॥ २१६ ॥
मूलम्-को बन्धः कस्य वा मोक्ष एकं पश्ये-
त्सदा हि सः ॥ २१७ ॥ एतत्करोति यो
नित्यं स मुक्तो नात्र संशयः॥ स एव योगी
सद्भक्तः सर्वलोकेषु पूजितः ॥ २१८ ॥
टीका-कौन बन्ध है और क्या मोक्ष है सर्वदा एक
परिपूर्ण आत्माको देखे जो योगी यह नित्य चिन्तन क-