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सर्वकोश
शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

Shiva Samhita with Hindi Commentary

भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished216 पृष्ठ

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पृष्ठ 171

पंचमपटलः । ( १६७ )
मूलम्-मूलाधारे हि यत्पद्मं चतुष्पत्रं व्यव-
स्थितम्॥तत्र कन्देस्ति या योनिस्तस्यां
सूर्यो व्यवस्थितः ॥ १४२ ॥
टीका-जो मूलाधारपद्म चारदलसे युक्तहै उस कमल-
के कन्दमें जो योनिहै इस योनिमें सूर्यस्थितहै ॥१४२॥
मूलम्-तत्सूर्य्यमण्डलद्वाराद्विषं क्षरति
सन्ततम्॥ १४३॥ पिंगलायां विषं तत्र सम-
र्पयति तापनः ॥ विषं तत्र वहन्ती या धा-
रारूपं निरन्तरम् ॥ दक्षनासापुटे याति
कल्पितेयन्तु पूर्ववत् ॥ १४४ ॥
टीका-वही सूर्य्यमण्डलसे निरन्तर विष स्रवताहै
और पिङ्गलाद्वारा गमन करताहै और वह विष सर्वदा
धारारूप पिङ्गलानाडीसे प्रवाहित रहताहै और यह
पिङ्गलानाडी दक्षिणनासापुटमें गईहै ॥ १४३ ॥१४४॥
मूलम्-आज्ञापङ्कजवामास्याद्दक्षनासापुटं
गता ॥ उदग्वहांपिंगलांपि पुरासीति
प्रकीर्तिता ॥ १४५ ॥
टीका-यह नाडी आज्ञाकमलके वामभागसे दक्षिण
नासिकापुटको गई है इस हेतुसे यह पिङ्गलानाडीको
असी कहते हैं ॥ १४५ ॥