शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपंचमपटलः । ( १२७ )
सुनो-अन्तःशुद्धिके अर्थ गोमुखके सदृश वस्त्र भक्षण
करके तब धौति प्रक्षालन करना अर्थात् धौतियोग
करना नाडीचालनका ज्ञान वायुका प्रत्याहार निरोध
करना कुण्डलिनीके बोधार्थ उदरको भ्रमावना इन्द्रिय-
द्वारा शीघ्र प्रवेश नाडीकर्म अर्थात् नाडीशुद्धिके हेतु
आहारीय विचार यह सब ज्ञानरूप विघ्न हैं हेदेवी क-
ल्याणी ! नाडीशुद्धिके अर्थ जो भोजनविधि है सो हम
कहतेंहैं सुनो ॥ ९ ॥ १० ॥ ११ ॥
मूलम्-नवधातुरसं छिन्धि शुण्ठिकास्ता-
डयेत्पुनः ॥ एककालं समाधिः स्याल्लिं-
गभूतमिदं शृणु ॥ १२ ॥
टीका-नवीन रससहित भोजन वस्तु और शुण्ठी-
चूर्ण भोजनकरे इससे शीघ्र समाधि होजायगी. हे देवी !
अब उसका चिह्न कहतेंहैं सुनो ॥ १२ ॥
मूलम्-सङ्गमं गच्छ साधूनां सङ्कोचं भज
दुर्जनात् ॥ प्रवेशनिर्गमे वायौर्गुरुलक्षं
विलोकयेत् ॥ १३ ॥
टीका-साधुके सङ्गकी अभिलाषा और दुर्जनसे अ-
लग रहनेका विचार रखना और वायुके प्रवेश निर्गममें
और वायुके निरोध समय मात्रासे गुरुलघुके विचा-
रार्थ संख्या करना ॥ १३ ॥