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सर्वकोश
शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)

Shiva Samhita with Hindi Commentary

भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished216 पृष्ठ

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पृष्ठ 115

चतुर्थपटलः । ( १११ )
यम् ॥ विपरीतकृतिश्चैषा सर्वतन्त्रेषु गो-
पिता ॥ ६९ ॥
टीका-साधक अपने शिरको भूमिपर धरे और
दोनों चरणोंको ऊपर आकाशमें निरालम्ब स्थिर करे यह
विपरीतकरणी मुद्रा सर्वतन्त्रोंकरके गोपित है अर्थात्
प्रकाश करने योग्य नहीं है ॥ ६९ ॥
मूलम्-एतद्यः कुरुते नित्यमभ्यासं याम-
मात्रतः ॥ मृत्युं जयति योगीशः प्रलये
नापि सीदति ॥ ७० ॥
टीका-इसप्रकारसे इस मुद्राका अभ्यास नित्य
एक प्रहर करे तो योगी निश्चय मृत्युको जीतलेगा
और प्रलयमेंभी उसको कुछ कष्ट न होगा ॥ ७० ॥
मूलम्-कुरुतेऽमृतपानं यः सिद्धानां सम-
तामियात् ॥ स सेव्यः सर्वलोकानां बन्ध-
मेनं करोति यः ॥ ७१ ॥
टीका-जो पुरुष शरीरस्थअमृतपान करता है उस-
को सिद्धोंकी समता प्राप्त होती है और इस मुद्राबन्ध-
को जो करताहै वह सर्वलोकमें पूजनीय है ॥ ७१ ॥
मूलम्-नाभेरूर्ध्वमधश्चापि तानं पश्चिम-
माचरेत् ॥ उड्ड्यानबंध एष स्यात्सर्वदुः-