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सर्वकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

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पृष्ठ 813
  • वायवीयसंहिता *
    ७९९

एता वै मातरः सप्त सर्वलोकस्य मातरः।
प्रार्थितं मे प्रयच्छन्तु परमेश्वरशासनात् ॥ ६६ ॥

ब्रह्माणी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, माहेन्द्री तथा प्रचण्ड पराक्रमशालिनी चामुण्डादेवी—ये सर्वलोकजननी सात माताएँ परमेश्वर शिवके आदेशसे मुझे मेरी प्रार्थित वस्तु प्रदान करें ॥ ६५-६६ ॥

मत्तमातङ्गवदनो गङ्गोमाशङ्करात्मजः।
आकाशदेहो दिग्बाहुः सोमसूर्याग्निलोचनः ॥ ६७ ॥
ऐरावतादिभिर्दिव्यैर्दिग्गजैर्नित्यमर्चितः।
शिवज्ञानमदोद्भिन्नस्त्रिदशानामविघ्नकृत् ॥ ६८ ॥
विघ्नकृच्चासुरादीनां विघ्नेशः शिवभावितः।
सत्कृत्य शिवयोराज्ञां स मे दिशतु काङ्क्षितम् ॥ ६९ ॥

जिनका मतवाले हाथीका-सा मुख है; जो गंगा, उमा और शिवके पुत्र हैं; आकाश जिनका शरीर है, दिशाएँ भुजाएँ हैं तथा चन्द्रमा, सूर्य और अग्नि जिनके तीन नेत्र हैं; ऐरावत आदि दिव्य दिग्गज जिनकी नित्य पूजा करते हैं, जिनके मस्तकसे शिवज्ञानमय मदकी धारा बहती रहती है, जो देवताओंके विघ्नका निवारण करते और असुर आदिके कार्योंमें विघ्न डालते रहते हैं, वे विघ्नराज गणेश शिवसे भावित हो शिवा और शिवकी आज्ञा शिरोधार्य करके मेरा मनोरथ प्रदान करें ॥ ६७–६९ ॥

षण्मुखः शिवसम्भूतः शक्तिवज्रधरः प्रभुः।
अग्नेश्च तनयो देवो ह्यपर्णात Francis नयः पुनः ॥ ७० ॥
गङ्गायाश्च गणाम्बायाः कृत्तिकानां तथैव च।
विशाखेन च शाखेन नैगमेयेन चावृतः ॥ ७१ ॥
इन्द्रजिच्चेन्द्रसेनानीस्तारकासुरजित्तथा।
शैलानां मेरुमुख्यानां वेधकश्च स्वतेजसा ॥ ७२ ॥
तप्तचामीकरप्रख्यः शतपत्रदलेक्षणः।
कुमारः सुकुमाराणां रूपोदाहरणं महत् ॥ ७३ ॥
शिवप्रियः शिवासक्तः शिवपादार्चकः सदा।
सत्कृत्य शिवयोराज्ञां स मे दिशतु काङ्क्षितम् ॥ ७४ ॥

जिनके छः मुख हैं, भगवान् शिवसे जिनकी उत्पत्ति हुई है, जो शक्ति और वज्र धारण करनेवाले प्रभु हैं, अग्निके पुत्र तथा अपर्णा (शिवा)-के बालक हैं; गंगा, गणाम्बा तथा कृत्तिकाओंके भी पुत्र हैं; विशाख, शाख और नैगमेय—इन तीनों भाइयोंसे जो सदा घिरे रहते हैं; जो इन्द्र-विजयी, इन्द्रके सेनापति तथा तारकासुरको परास्त करनेवाले हैं; जिन्होंने अपनी शक्तिसे मेरु आदि पर्वतोंको छेद डाला है, जिनकी अंगकान्ति तपाये हुए सुवर्णके समान है, नेत्र प्रफुल्ल कमलके समान सुन्दर हैं, कुमार नामसे जिनकी प्रसिद्धि है, जो सुकुमारोंके रूपके सबसे बड़े उदाहरण हैं; शिवके प्रिय, शिवमें अनुरक्त तथा शिव-चरणोंकी नित्य अर्चना करनेवाले हैं; स्कन्द, शिव और शिवाकी आज्ञा शिरोधार्य करके मुझे मनोवांछित वस्तु दें ॥ ७०-७४ ॥

ज्येष्ठा वरिष्ठा वरदा शिवयोर्यजने रता।
तयोराज्ञां पुरस्कृत्य सा मे दिशतु काङ्क्षितम् ॥ ७५ ॥

सर्वश्रेष्ठ और वरदायिनी ज्येष्ठादेवी, जो सदा भगवान् शिव और पार्वतीके पूजनमें लगी रहती हैं, उन दोनोंकी आज्ञा मानकर मुझे मनोवांछित वस्तु प्रदान करें ॥ ७५ ॥

त्रैलोक्यवन्दिता साक्षादुल्काकारा गणाम्बिका।
जगत्सृष्टिविवृद्ध्यर्थं ब्रह्मणाभ्यर्थिता शिवात् ॥ ७६ ॥
शिवायाः प्रविभक्ताया भुवोरन्तरनिस्सृता।
दाक्षायणी सती मेना तथा हैमवती ह्युमा ॥ ७७ ॥
कौशिक्याश्चैव जननी भद्रकाल्यास्तथैव च।
अपर्णायाश्च जननी पाटलायास्तथैव च ॥ ७८ ॥
शिवार्चनरता नित्यं रुद्राणी रुद्रवल्लभा।
सत्कृत्य शिवयोराज्ञां सा मे दिशतु काङ्क्षितम् ॥ ७९ ॥