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सर्वकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

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पृष्ठ 702

६८८ * संक्षिप्त शिवपुराण *


पूर्ण करो।' परमेश्वर शिवकी इस आज्ञाको शिरोधार्य करके वह देवी ब्रह्माजीकी प्रार्थनाके अनुसार दक्षकी पुत्री हो गयी। इस प्रकार ब्रह्माजीको ब्रह्मरूपिणी अनुपम शक्ति देकर देवी शिवा महादेवजीके शरीरमें प्रविष्ट हो गयीं। फिर महादेवजी भी अन्तर्धान हो गये। तभीसे इस जगत्‌के भीतर स्त्रीजातिमें भोग प्रतिष्ठित हुआ और मैथुनद्वारा प्रजाकी सृष्टिका कार्य चलने लगा। मुनिवरो! इससे ब्रह्माजीको भी आनन्द और संतोष प्राप्त हुआ। देवीसे शक्तिके प्रादुर्भावका यह सारा प्रसंग मैंने तुम्हें कह सुनाया। प्राणियोंकी सृष्टिके प्रसंगमें इस विषयका वर्णन किया गया है। यह पुण्यकी वृद्धि करनेवाला है, अतः अवश्य सुननेयोग्य है। जो प्रतिदिन देवीसे शक्तिके प्रादुर्भावकी इस कथाका कीर्तन करता है, उसे सब प्रकारका पुण्य प्राप्त होता है तथा वह शुभलक्षण पुत्र पाता है।

(अध्याय १६)


भगवान् शिवका पार्वती तथा पार्षदोंके साथ मन्दराचलपर जाकर रहना, शुम्भ-निशुम्भके वधके लिये ब्रह्माजीकी प्रार्थनासे शिवका पार्वतीको ‘काली’ कहकर कुपित करना और कालीका ‘गौरी’ होनेके लिये तपस्याके निमित्त जानेकी आज्ञा माँगना

वायुदेवता कहते हैं—इस प्रकार महादेवजीसे ही सनातन पराशक्तिको पाकर प्रजापति ब्रह्मा मैथुनी सृष्टि करनेकी इच्छा लेकर स्वयं भी आधे शरीरसे अद्भुत नारी और आधे शरीरसे पुरुष हो गये। आधे शरीरसे जो नारी उत्पन्न हुई थी, वह उनसे शतरूपा ही प्रकट हुई थी। ब्रह्माजीने अपने आधे पुरुष-शरीरसे विराट्‌को उत्पन्न किया। वे विराट् पुरुष ही स्वायम्भुव मनु कहलाते हैं। देवी शतरूपाने अत्यन्त दुष्कर तपस्या करके उद्दीप्त यशवाले मनुको ही पतिरूपमें प्राप्त किया।

इसके पश्चात् मनुके वंश तथा दक्ष-यज्ञ-विध्वंस आदिके प्रसंग सुनाकर वायुदेवताने यह बताया कि भगवान् शंकरने दक्ष तथा देवताओंके अपराध क्षमा कर दिये।

तदनन्तर ऋषियोंने पूछा—प्रभो! अपने गणों तथा देवीके साथ अन्तर्धान होकर भगवान् शिव कहाँ गये, कहाँ रहे और क्या करके विरत हुए?

वायुदेव बोले—महर्षियो! पर्वतोंमें श्रेष्ठ और विचित्र कन्दराओंसे सुशोभित जो परम सुन्दर मन्दराचल है, वही अपनी तपस्याके प्रभावसे देवाधिदेव महादेवजीका प्रिय निवास-स्थान हुआ। उसने पार्वती और शिवको अपने सिरपर ढोनेके लिये बड़ा भारी तप किया था और दीर्घकालके बाद उसे उनके चरणारविन्दोंके स्पर्शका सुख प्राप्त हुआ। उस पर्वतके सौन्दर्यका विस्तारपूर्वक वर्णन सहस्रों मुखोंद्वारा सौ करोड़ वर्षोंमें भी नहीं किया जा सकता। उसके सामने समस्त पर्वतोंका सौन्दर्य तुच्छ हो जाता है। इसीलिये महादेवजीने देवीका