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सर्वकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

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५३२ * संक्षिप्त शिवपुराण *

आपकी ही हूँ और आपके ही आश्रयमें रहती हूँ। अतः मेरी बातको भी प्रमाणित (सत्य) कीजिये। यह राक्षसी दारुका देवी है—मेरी ही शक्ति है और राक्षसियोंमें बलिष्ठ है। अतः यही राक्षसोंके राज्यका शासन करे। ये राक्षस-पत्नियां जिन पुत्रोंको पैदा करेंगी, वे सब मिलकर इस वनमें निवास करें, ऐसी मेरी इच्छा है।

शिव बोले—प्रिये! यदि तुम ऐसी बात कहती हो तो मेरा यह वचन सुनो। मैं भक्तोंका पालन करनेके लिये प्रसन्नतापूर्वक इस वनमें रहूँगा। जो पुरुष यहाँ वर्णधर्मके पालनमें तत्पर हो प्रेमपूर्वक मेरा दर्शन करेगा, वह चक्रवर्ती राजा होगा। कलियुगके अन्त और सत्ययुगके आरम्भमें महासेनका पुत्र वीरसेन राजाओंका भी राजा होगा। वह मेरा भक्त और अत्यन्त पराक्रमी होगा और यहाँ आकर मेरा दर्शन करेगा। दर्शन करते ही वह चक्रवर्ती सम्राट् हो जायगा।

सूतजी कहते हैं—ब्राह्मणो! इस प्रकार बड़ी-बड़ी लीलाएँ करनेवाले वे दम्पति परस्पर हास्ययुक्त वार्तालाप करके स्वयं वहाँ स्थित हो गये। ज्योतिर्लिंगस्वरूप महादेवजी वहाँ नागेश्वर कहलाये और शिवादेवी नागेश्वरीके नामसे विख्यात हुईं। वे दोनों ही सत्पुरुषोंको प्रिय हैं।

इस प्रकार ज्योतियोंके स्वामी नागेश्वर नामक महादेवजी ज्योतिर्लिंगके रूपमें प्रकट हुए। वे तीनों लोकोंकी सम्पूर्ण कामनाओंको सदा पूर्ण करनेवाले हैं। जो प्रतिदिन आदरपूर्वक नागेश्वरके प्रादुर्भावका यह प्रसंग सुनता है, वह बुद्धिमान् मानव महापातकोंका नाश करनेवाले सम्पूर्ण मनोरथोंको प्राप्त कर लेता है।

(अध्याय २९-३०)


रामेश्वर नामक ज्योतिर्लिंगके आविर्भाव तथा माहात्म्यका वर्णन

सूतजी कहते हैं—ऋषियो! अब मैं यह बता रहा हूँ कि रामेश्वर नामक ज्योतिर्लिंग पहले किस प्रकार प्रकट हुआ। इस प्रसंगको तुम आदरपूर्वक सुनो। भगवान् विष्णुके रामावतारमें जब रावण सीताजीको हरकर लंकामें ले गया, तब सुग्रीवके साथ अठारह पद्म वानरसेना लेकर श्रीराम समुद्रतटपर आये। वहाँ वे विचार करने लगे कि कैसे हम समुद्रको पार करेंगे और किस प्रकार रावणको जीतेंगे। इतनेमें ही श्रीरामको प्यास लगी। उन्होंने जल माँगा और वानर मीठा जल ले आये। श्रीरामने प्रसन्न होकर वह जल ले लिया। तबतक उन्हें स्मरण हो आया कि ‘मैंने अपने स्वामी

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