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सर्वकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

पृष्ठ 536, कुल 850 में से

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* संक्षिप्त शिवपुराण *

सूतजी कहते हैं—मुनिवरो! इस तरह काशीका तथा विश्वेश्वरलिंगका प्रचुर माहात्म्य बताया गया है, जो सत्पुरुषोंको भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाला है। इसके बाद मैं त्र्यम्बक नामक ज्योतिर्लिंगका माहात्म्य बताऊँगा, जिसे सुनकर मनुष्य क्षणभरमें समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है।
(अध्याय २३)



### त्र्यम्बक ज्योतिर्लिंगके प्रसंगमें महर्षि गौतमके द्वारा किये गये परोपकारकी कथा, उनका तपके प्रभावसे अक्षय जल प्राप्त करके ऋषियोंकी अनावृष्टिके कष्टसे रक्षा करना; ऋषियोंका छलपूर्वक उन्हें गोहत्यामें फँसाकर आश्रमसे निकालना और शुद्धिका उपाय बताना

सूतजी कहते हैं—मुनिवरो! सुनो, मैंने सद्गुरु व्यासजीके मुखसे जैसी सुनी है, उसी रूपमें एक पापनाशक कथा तुम्हें सुना रहा हूँ। पूर्वकालकी बात है, गौतम नामसे विख्यात एक श्रेष्ठ ऋषि रहते थे, जिनकी परम धार्मिक पत्नीका नाम अहल्या था। दक्षिण-दिशामें जो ब्रह्मगिरि है, वहीं उन्होंने दस हजार वर्षोंतक तपस्या की थी। उत्तम व्रतका पालन करनेवाले महर्षियो! एक समय वहाँ सौ वर्षोंतक बड़ा भयानक अवर्षण हो गया। सब लोग महान् दुःखमें पड़ गये। इस भूतलपर कहीं गीला पत्ता भी नहीं दिखायी देता था। फिर जीवोंका आधारभूत जल कहाँसे दृष्टिगोचर होता। उस समय मुनि, मनुष्य, पशु, पक्षी और मृग— सब वहाँसे दसों दिशाओंको चले गये। तब गौतम ऋषिने छः महीनेतक तप करके वरुणको प्रसन्न किया। वरुणने प्रकट होकर वर माँगनेको कहा—ऋषिने वृष्टिके लिये प्रार्थना की। वरुणने कहा—‘देवताओंके विधानके विरुद्ध वृष्टि न करके मैं तुम्हारी इच्छाके अनुसार तुम्हें सदा अक्षय रहनेवाला जल देता हूँ। तुम एक गड्ढा तैयार करो।’

उनके ऐसा कहनेपर गौतमने एक हाथ गहरा गड्ढा खोदा और वरुणने उसे दिव्य जलके द्वारा भर दिया तथा परोपकारसे सुशोभित होनेवाले मुनिश्रेष्ठ गौतमसे कहा—‘महामुने! कभी क्षीण न होनेवाला यह जल तुम्हारे लिये तीर्थरूप होगा और पृथ्वीपर तुम्हारे ही नामसे इसकी ख्याति होगी। यहाँ किये हुए दान, होम, तप, देवपूजन तथा पितरोंका श्राद्ध—सभी अक्षय होंगे।’

ऐसा कहकर उन महर्षिसे प्रशंसित हो वरुणदेव अन्तर्धान हो गये। उस जलके द्वारा दूसरोंका उपकार करके महर्षि गौतमको भी बड़ा सुख मिला। महात्मा पुरुषका आश्रय मनुष्योंके लिये महत्त्वकी ही प्राप्ति करानेवाला होता है। महान् पुरुष ही महात्माके उस स्वरूपको देखते और समझते हैं, दूसरे अधम मनुष्य नहीं। मनुष्य जैसे पुरुषका सेवन करता है, वैसा ही फल पाता है। महान् पुरुषकी सेवासे महत्ता मिलती है और क्षुद्रकी सेवासे क्षुद्रता। उत्तम पुरुषोंका यह स्वभाव ही है कि वे दूसरोंके दुःखको नहीं सहन कर पाते। अपनेको दुःख प्राप्त हो जाय, इसे भी स्वीकार कर लेते हैं,
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