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सर्वकोश
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

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पृष्ठ 309

* रुद्रसंहिता * २९५

जाना है। भगवान् रुद्रको तू जैसा कहता है, वे वैसे ही क्यों न हों, उनके-जैसे भी बहुसंख्यक रूप क्यों न हों, सत्पुरुषोंके प्रियतम नित्य-निर्विकार वे भगवान् शिव ही मेरे अभीष्टतम देव हैं। ब्रह्मा और विष्णु भी कभी उन महात्मा हरके समान नहीं हो सकते। फिर दूसरे देवताओंकी तो बात ही क्या है? क्योंकि वे सदैव कालके अधीन हैं। इस प्रकार अपनी शुद्धबुद्धिसे तत्त्वतः विचारकर मैं शिवके लिये वनमें आकर बड़ी भारी तपस्या कर रही हूँ। वे भक्तवत्सल सर्वेश्वर शिव ही हम सबके परमेश्वर हैं। दीनोंपर अनुग्रह करनेवाले उन महादेवको ही प्राप्त करनेकी मेरी इच्छा है।

ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! ऐसा कहकर गिरिराजनन्दिनी गिरिजा चुप हो गयीं और निर्विकार चित्तसे भगवान् शिवका ध्यान करने लगीं। देवीकी बात सुनकर वह ब्रह्मचारी ब्राह्मण ज्यों ही कुछ फिर कहनेके लिये उद्यत हुआ, त्यों ही शिवमें आसक्तचित्त होनेके कारण उनकी निन्दा सुननेसे विमुख हुई पार्वती अपनी सखी विजयासे शीघ्र बोलीं।

पार्वतीने कहा—सखी! इस अधम ब्राह्मणको यत्नपूर्वक रोको, यह फिर कुछ कहना चाहता है। यह केवल शिवकी निन्दा ही करेगा, जो शिवकी निन्दा करता है, केवल उसीको पाप नहीं लगता, जो उस निन्दाको सुनता है, वह भी यहाँ पापका भागी होता है।* भगवान् शिवके उपासकोंको चाहिये कि वे शिवकी निन्दा करनेवालेका सर्वथा वध करें। यदि वह ब्राह्मण हो तो उसे अवश्य ही त्याग दें और स्वयं उस निन्दाके स्थानसे शीघ्र दूर चले जायँ। यह दुष्ट ब्राह्मण फिर शिवकी निन्दा करेगा। ब्राह्मण होनेके कारण यह वध्य तो है नहीं, अतः त्याग देनेयोग्य है। किसी तरह भी इसका मुँह नहीं देखना चाहिये। इस स्थानको छोड़कर हमलोग आज ही किसी दूसरे स्थानमें शीघ्र चली चलें, जिससे फिर इस अज्ञानीके साथ बात करनेका अवसर न मिले।

ब्रह्माजी कहते हैं—नारद! ऐसा कहकर उमाने ज्यों ही अन्यत्र जानेके लिये पैर उठाया, त्यों ही भगवान् शिवने अपने साक्षात् स्वरूपसे प्रकट हो प्रिया पार्वतीका हाथ पकड़ लिया। शिवा जैसे स्वरूपका ध्यान करती थीं, वैसा ही सुन्दर रूप धारण करके शिवने उन्हें दर्शन दिया। पार्वतीने लज्जावश अपना मुँह नीचेकी ओर कर लिया।

तब भगवान् शिव उनसे बोले—प्रिये! मुझे छोड़कर कहाँ जाओगी ? अब मैं फिर कभी तुम्हारा त्याग नहीं करूँगा। मैं प्रसन्न हूँ। वर माँगो। मुझे तुम्हारे लिये कुछ भी अदेय नहीं है। देवि! आजसे मैं तपस्याके मोल खरीदा हुआ तुम्हारा दास हूँ। तुम्हारे सौन्दर्यने भी मुझे मोह लिया है। अब तुम्हारे बिना मुझे एक क्षण भी युगके समान जान पड़ता है। लज्जा छोड़ो। तुम तो मेरी सनातन पत्नी हो। गिरिराजनन्दिनि! महेश्वरि! मैंने जो कुछ कहा है, उसपर श्रेष्ठ बुद्धिसे विचार


* न केवलं भवेत् पापं निन्दाकर्तुः शिवस्य हि। यो वै शृणोति तन्निन्दां पापभाक् स भवेदिह॥
(शि० पु० रू० सं० पा० खं० २८। ३७)