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शिशुपालवधम् (महाकवि माघ - सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Shishupalavadham of Magha Hindi

महाकवि माघ द्वारा

स्रोत: Shishupalavadham with Sanskrit Shlokas & Hindi Anvaya Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished14 पृष्ठ

प्रारंभिक पृष्ठ व विषय-सूची

श्रीदत्तकसूनुमहाकविमाघप्रणीतं

शिशुपालवधमहाकाव्यम्

शुद्धम् | सरलम् | सुन्दरम्
विविधपाठान्तरसहितः
सप्रसङ्गमूलपाठः
{कृष्णनारदसम्भाषणं नाम प्रथमः सर्गः}
(NET/PGT, GIC/GGIC/GDC, IAS & OTHER COMPETITIVE EXAMS)


परिष्कर्ता परिकल्पनाकारश्च-:अक्षरसंयोजनम्-:
डॉ. श्रीओमशर्मा (सहायकाचार्यः)<br>व्याकरणविभागः, केन्द्रीयसंस्कृतविश्वविद्यालयः<br>श्रीरघुनाथकीर्तिपरिसरः, देवप्रयागः (उत्तराखण्डः)श्री शुभम शर्मा (छोटू)<br>(शोधच्छात्रः)

ई-बुक्-संस्करणम्— प्रथमम्; आश्विन-नवरात्रम् (विक्रमसंवत्-२०७९) ख्रिस्ताब्दः- 2022.09.26
स्थानम्— देवप्रयागः, पौड़ी-गढ़वालम्, उत्तराखण्डः-२४९३०१
© प्रकाशकः— संस्कृतसारः
मूल्यम्— अमूल्यम्

अस्माकं सम्पर्कसूत्राणि—

  • e-mail अणुवाक्—: [email protected]
  • व्हाट्सैप्— ८८९९१८७९२९ (भवतां परामर्शानां स्वागतम्)
  • YouTube — संस्कृतसारः @sanskrit sar
  • FACEBOOK— @sanskrit_shiksha संस्कृतशिक्षा

Title:— शिशुपालवधम् (shishupalavadham)

Author's name:— Mahakavi Magha

Editor's name:— Shriom Sharma

Published by:— Self Published by Sanskrit sar

Publisher 's Address:— CSU Shri Raghunath Kriti
Parisar, Devaprayag, Pauri-
garhwal, Uttarakhand-249301

Printer's Details :— E-book

Edition Details:— I

E-ISBN :— --------

Copyright:— © संस्कृतसारः (Sanskrit sar)

समर्पणम्

स्वामी श्री महानन्द ब्रह्मचारी जी महाराज
संस्थापक— रुक्मिणी वल्लभ धाम, अवन्तिका देवी, बुलन्दशहर, उ.प्र.

गायत्रीमखदत्तजीवनहविर्गोब्राह्मणश्रेयसां
विद्यादानजुषां शिवक्रतुयुजामानन्दलोकात्मनाम्।
श्रीओमेण समर्प्यते यतिमहानन्दाख्यपुण्यात्मनां
माघस्याद्य परिष्कृतं सुखकृतं रूपं हि हस्ताब्जयोः॥

प्रास्ताविकम्

अस्य संस्करणस्य आवश्यकता —

अब परीक्षाओं का स्तर ऐसा हो गया है जिसमें मूल श्लोकों को लेकर भीतर से प्रश्न पूछे जाते हैं। एतदर्थ हमें ऐसे संस्करण की आवश्यकता थी जिसमें ‘शिशुपालवधम्’ प्रथमसर्ग का केवल मूलपाठ दिया गया हो ताकि अधिक पेज पलटने का श्रम न हो, जिससे ग्रन्थ को कण्ठस्थ किया जा सके, लेकिन बाद में ध्यान आया केवल ‘तोता-रटन्त’ से भी ज्यादा लाभ नहीं होता। यह बात स्पष्ट होनी चाहिए कि कम से कम श्लोक में किसके बारे में क्या कहा जा रहा है। पाठ करते-करते यह पता चल जाए इसलिए प्रत्येक श्लोक का प्रसङ्ग भी शुरुआत में जोड़ दिया गया है। वैसे श्लोक के सम्पूर्ण अर्थ-ज्ञान के लिए अन्य सरल व्याख्याएँ उपलब्ध हैं। इसलिए श्लोकों की व्याख्या का समावेश हम यहाँ नहीं कर रहे हैं।

अस्य पाठस्य वैशिष्ट्यम्—

❖ दाक्षिणात्य-संस्करण या निर्णयसागर प्रेस के संस्करण में या अन्यत्र जहाँ भी हमें पाठभेद मिला उसको हमने टिप्पणी में अलग से दर्शा दिया है, जिससे किसी भी प्रदेशवासी के लिए यह संस्करण अतीवोपयोगी बन सके, किन्तु हमने अपने संस्करण के मूल पाठ में ‘शिशुपालवधम्’ के प्रसिद्ध टीकाकार महामहोपाध्याय श्रीमल्लिनाथ ने जो पाठ स्वीकार किया है, उसी पाठ को प्राथमिकता दी है। यथा श्लोक संख्या तीन में देखें—
चयस्त्विषामित्यवधारितं पुरा यहाँ पर ‘पुरा’ एवं ‘पुरस्’ दोनों ही पाठ मिलते हैं लेकिन सर्वङ्कषाकार श्रीमल्लिनाथ ने ‘पुरा’ पाठ माना है, अतः हमने भी अपने मूल में ‘पुरा’ पाठ ही दिया है।

❖ इस ग्रन्थ के प्रथम-सर्ग में वंशस्थ-छन्द का प्रयोग किया गया है। जिसकी यति (जिह्वा विश्रान्ति स्थान) १२-१२ अक्षरों पर होती है। श्लोकोच्चारण करते समय आप १२वें अक्षर पर रुकें। एतदर्थ हमने प्रत्येक श्लोक के चारों चरणों को चार अलग-अलग पङ्क्तियों में कर दिया है तथा साथ ही पादान्त में विभक्ति के अर्धाक्षर को पूर्व-पद के साथ ही जोड़ दिया है, जिससे छात्र वर्ग को शुद्ध उच्चारण करने तथा अर्थावगति में भी सरलता होगी। यथा —

अथ प्रयत्नोन्नमिताऽऽनमतफणैर्
धृते कथञ्चित्फणिनां गणैरधः।
न्यधायिषातामभिदेवकीसुतं
सुतेन धातुश्चरणौ भुवस्तले ॥१३॥

यहाँ पर आप देख सकते हैं ‘फणैर्- धृते’ में रेफ जो पूर्वपद में स्थित है जिसका उत्तरपद ‘धृते’ के धकार पर ऊर्ध्वगमन नहीं किया, ताकि ‘फणैर्’ पूर्वपद सविभक्तिक ही दिखाई दे।

अन्यच्च—

करोति कंसादिमहीभृतां वधाज्
जनो मृगाणामिव यत्तव स्तवम्।
हरे! हिरण्याक्षपुरःसरासुर-
द्विपद्विषः प्रत्युत सा तिरस्क्रिया ॥ ३९॥

ऐसे स्थलों पर सविभक्ति ‘वधाज्’ पादान्त पदों के कृतसन्धि अर्धाक्षर को अन्य संस्करणों की भांति अग्रिम पाद के साथ ‘वधाज्जनो’ इस प्रकार से नहीं जोड़ा गया है, बल्कि ‘वधाज्’ इस सविभक्तिक को एक साथ कर अग्रिम पाद के ‘जनो’ को नई पङ्क्ति से आरम्भ किया गया है जिससे उच्चारण में सौकर्य हो। इस प्रकार आपको हमारे संस्करण में सर्वत्र ऐसा पाठ देखने को मिलेगा।

❖ यद्यपि इस संस्करण को हमने परिशुद्धतम तैयार किया है, फिर भी मानव-स्वभावजन्य कोई त्रुटि आपको परिलक्षित हो तो हम आपके विचारों का 8899187929 इस व्हाट्सएप या इस [email protected] ई-मेल पर स्वागत करते हैं।

❖ यह ई-बुक् संस्करण है, अतः टेबलेट इत्यादि डिवाइस द्वारा इसे पढ़ने पर अच्छा अनुभव मिलेगा, अथवा आँखों की अच्छी सेहत के लिए कलर-प्रिंट लेकर पढ़ने में अच्छा अनुभव प्राप्त होगा।

❖ इस संस्करण के संस्कृत पाठ-सम्पादन संबन्धित कई महत्वपूर्ण सुझाव प्रो. विजयपाल शास्त्री जी (साहित्यविभागाध्यक्ष केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय श्री रघुनाथकीर्ति परिसर, देवप्रयाग) ने दिये हैं तथा इसी परिसर के हिंदी विभाग के सहायकाचार्य डॉ. वीरेन्द्र सिंह बर्त्वाल जी ने इस संस्करण में प्रयुक्त हिंदी वाक्यों को परिशुद्धता प्रदान की है, एतदर्थ हम दोनों महानुभावों के चिर कृतज्ञ रहेंगे।

❖ इस संस्करण में हमने निम्नलिखित ग्रन्थों से पाठान्तर पाठसंशोधन इत्यादि में पर्याप्त सहायता ली गई है, एतदर्थ हम इन व्याख्याकारों या सम्पादकों के सदैव ऋणी रहेंगे –

सहायकग्रन्थाः

व्याख्याकारः/ सम्पादकःप्रकाशकःसंस्करणम्वर्षम्
तारिणीशझारामनारायणलाल- विजयकुमारःप्रथमम्२०२०
जनार्दनशास्त्रीमोतीलाल-बनारसीदासःद्वितीयम्२०१२
हरगोविन्द शास्त्रीचौखम्बाविद्याभवनम्पुनर्मुद्रितम्२०१५
सी. राजेन्द्रःसाहित्य-अकादमीप्रथमम्२०१८
शिवदत्त दाधिमथःनिर्णयसागरः मुम्बईसप्तमम्१९१७
डॉ. गजाननशास्त्री मुसलगाँवकरःचौखम्बासंस्कृतभवनम् वाराणसीप्रथमम्वि०सं० २०५५

शिशुपालवधम्


प्रथमः सर्गः

शिशुपालवधे प्रथमः सर्गः


✡ वस्तुनिर्देशात्मक मङ्गलाचरण एवं श्रीकृष्ण द्वारा आकाश से उतरते हुए मुनि नारद को देखने का वर्णन—
श्रियः पतिः श्रीमति शासितुं जगज्
जगन्निवासो वसुदेवसद्मनि ।
वसन् ददर्शावतरन्तमम्बराद्
हिरण्यगर्भाङ्गभुवं मुनिं हरिः ॥ १॥

✡ सर्वप्रथम भगवान् कृष्ण ने नारद को आकाशमार्ग से आते हुए देखा। तदनन्तर नगरवासी उन्हें विस्मयपूर्वक देखने लगे—
गतं तिरश्चीनमनूरुसारथेः
प्रसिद्धमूर्ध्वज्वलनं हविर्भुजः ।
पतत्यधो धाम विसारि सर्वतः
किमेतदित्याकुलमीक्षितं जनैः ॥ २ ॥

✡ लोगों के द्वारा आकुलता पूर्वक देखे जाने पर भगवान् ने उन्हें नारद समझा—
चयस्त्विषामित्यवधारितं पुरा¹
ततः शरीरीति विभाविताकृतिम् ।
विभुर्विभक्तावयवं पुमानिति
क्रमादमुं नारद इत्यबोधि सः ॥ ३ ॥

✡ अब यहाँ से सात श्लोकों में (अर्थात् चौथे से दसवें श्लोक तक) नारद मुनि का वर्णन किया गया है।
उनकी उपमा सर्वप्रथम शिव से देते हैं —
नवानधोऽधो बृहतः पयोधरान्
समूढकर्पूरपरागपाण्डुरम् ।
क्षणं क्षणोद्धिक्षिप्तगजेन्द्रकृत्तिना
स्फुटोपमं भूतिसितेन शम्भुना ॥ ४ ॥

✡ इस श्लोक में महर्षि नारद की तुलना हिमालय से की गई है —
दधानमम्भोरुहकेसरद्युतीर्
जटाः शरच्चन्द्रमरीचिरोचिषम् ।
विपाकपिङ्गास्तुहिनस्थलीरुहो
धराधरेन्द्रं व्रततीततीरिव ॥ ५ ॥

✡ यहाँ नारद मुनि का साम्य बलराम से प्रदर्शित किया है—
पिशङ्गमौञ्जीयुजमर्जुनच्छविं
वसानमेणाजिनमञ्जनद्युति ।
सुवर्णसूत्राकलिताधराम्बरं
विडम्बयन्तं शितिवाससस्तनुम् ॥ ६ ॥

✡ इस श्लोक में नारद जी की समानता शरत्काल में विद्युत्पुञ्ज से युक्त शुभ्र मेघ से की गई है—
विहङ्गराजाङ्गरुहैरवायतैर्
हिरण्मयोर्वीरूहवल्लितन्तुभिः ।
कृतोपवीतं हिमशुभ्रमुच्चकैर्
घनं घनान्ते तडितां गणैरिव² ॥ ७ ॥

✡ झूल से सुशोभित इन्द्रवाहन ऐरावत से नारद का साम्य वर्णन किया है—
निसर्गचित्रोज्ज्वलसूक्ष्मपक्ष्मणा
लसद्विसच्छेदसिताङ्गसङ्गिना ।
चकासतं चारुचमूरुचर्मणा
कुथेन नागेन्द्रमिवेन्द्रवाहनम् ॥ ८ ॥

✡ नारद मुनि अपने हाथ में स्फटिक की अक्षमाला लिए हुए हैं। उस पर रक्त अङ्गुष्ठ का प्रकाश पड़ने से ऐसा प्रतीत होता है मानो मूँगे की माला ही धारण किये हों—
अजस्रमास्फालित³वल्लकीगुण-
क्षतोज्ज्वलाङ्गुष्ठनखांशुभिन्नया ।
पुरः प्रवालै⁴रिव पूरितार्धया
विभान्तमच्छस्फटिकाक्षमालया ॥ ९ ॥

✡ भगवान् कृष्ण ने अपनी ‘महती’ नामक वीणा का (जिसमें ग्राम और मूर्च्छनाएँ स्पष्ट हो रही हैं) बार-बार अवलोकन करते हुए नारद मुनि को देखा —
रणद्भिराघट्टनया नभस्वतः
पृथग्विभिन्नश्रुतिमण्डलैः स्वरैः ।
स्फुटीभवद्ग्रामविशेषमूर्च्छनाम्
अवेक्षमाणं महतीं मुहुर्मुहुः ॥ १० ॥

✡ नारद जी अपने पीछे आते हुए देवताओं को लौटाकर भगवान् श्रीकृष्ण के निवासस्थान पर पहुँचते हैं —


¹ 'पुरस्' इति पाठान्तरम् ।
² 'गुणैरिव' इति पाठान्तरम् ।
³ 'माश्नावित' इति पाठान्तरम् ।
⁴ 'प्रचालै' इति पाठान्तरम् ।

पृष्ठम्ः- ०१

शिशुपालवधे प्रथमः सर्गः


निवर्त्य सोऽनुव्रजतः कृतानतीन्<br>अतीन्द्रियज्ञाननिधिर्नभःसदः ।<br>समासदत् सादितदैत्यसम्पदः<br>पदं महेन्द्रालयचारु चक्रिणः ॥ ११ ॥महामहानीलशिलारुचः पुरो<br>निषेदिवान् कंसकृषः स विष्टरे ।<br>श्रितोदयाद्रेरभिसाद्यमुच्चकैर्<br>अचूचुरच्चन्द्रमसोऽभिरामताम् ॥ १६ ॥
✡ भगवान् श्रीकृष्ण ने नारद जी के भूमि पर आने के पूर्व अपने आसन से उठकर उनका स्वागत किया —<br>पतत्पतङ्ग¹प्रतिमस्तपोनिधिः<br>पुरोऽस्य यावन्न भुवि व्यलीयत ।<br>गिरेस्तडित्वानिव तावदुच्चकैर्<br>जवेन पीठादुदतिष्ठदच्युतः ॥ १२ ॥✡ नारद जी के यथाविधि पूजन के पश्चात् भगवान् श्रीकृष्ण की प्रसन्नता का कवि वर्णन कर रहा है —<br>विधाय तस्यापचितिं प्रसेदुषः<br>प्रकाममप्रीयत यज्वनां प्रियः ।<br>ग्रहीतुमार्यान् परिचर्यया मुहुर्<br>महानुभावा हि नितान्तमर्थिनः ॥ १७ ॥
✡ महाकवि माघ नारद जी के पृथ्वी पर पैर रखने का वर्णन करते हैं —<br>अथ प्रयत्नो²न्नमिताऽऽनमतफणैर्<br>धृते कथञ्चित्फणिनां गणैरधः ।<br>न्यधायिषातामभिदेवकीसुतं<br>सुतेन धातुश्चरणौ भुवतले ॥ १३ ॥✡ नारदजी ने अपने कमण्डलु में रखे हुए समस्त तीर्थों के जल से श्रीकृष्ण का अभिषेक किया तथा भगवान् श्रीकृष्ण ने उसे नम्रतापूर्वक सिर झुकाकर ग्रहण किया—<br>अशेषतीर्थोपहृताः कमण्डलोर्<br>निधाय पाणाववृषाभिभाभ्युदीरिताः ।<br>अघौघविध्वंसविधौ पटीयसीर्<br>नतेन मूर्ध्ना हरिरग्रहीदपः ॥ १८ ॥
✡ इसके अनन्तर आदिपुरुष भगवान् श्रीकृष्ण ने पूजार्ह नारद का विधिपूर्वक पूजन किया—<br>तमर्घ्यमर्घ्या³दिकयाऽऽदिपूरुषः<br>सपर्यया साधु स पर्य्यपूजत् ।<br>गृहानुपैतुं प्रणयादभीप्सवो<br>भवन्ति नाऽपुण्यकृतां मनीषिणः ॥ १४ ॥✡ नारद मुनि की आज्ञा से भगवान् श्रीकृष्ण जिस सुवर्णमय आसन पर विराजमान हुए उसका वर्णन कवि कर रहा है—<br>स काञ्चने यत्र मुनेरनुज्ञया<br>नवाम्बुद⁵श्यामवपुर्न्यविक्षत ।<br>जिगाय जम्बूनजनितश्रियः श्रियं<br>सुमेरुशृङ्गस्य तदा तदासनम् ॥ १९ ॥
✡ इस श्लोक में कवि भगवान् श्रीकृष्ण के द्वारा नारद जी को आसन प्रदान करने का वर्णन करते हैं—<br>न यावदेतावुपदश्यदुत्थितौ<br>जनस्तुषाराञ्जनपर्वताविव⁴ ।<br>स्वहस्तदत्ते मुनिमासने मुनिश्<br>चिरन्तनावदभिन्यवीविशत् ॥ १५॥✡ यहाँ कवि आसनोपविष्ट कृष्ण की समुद्र से क्षमता प्रदर्शित करते हुए कहते हैं—<br>स तप्तकार्तस्वरभास्वराम्बरः<br>कठोरताराधिपलाञ्छनच्छविः ।<br>विद्युद्युते वाडवजातवेदसः<br>शिखाभिराश्लिष्ट इवाम्भसां निधिः ॥ २०॥
✡ नीलपर्वत के समान श्रीकृष्ण के सम्मुख आसन पर स्थित नारद जी ने उदयाचल पर आरूढ़ चन्द्रमा की शोभा को धारण किया —✡ इस श्लोक में नारद जी के कान्ति की हरि के श्यामल किरणों से मिश्रित होने का वर्णन है—

¹ 'पतन् पतङ्ग' इति पाठान्तरम् ।<br>² 'प्रयत्ने' इति पाठान्तरम् ।<br>³ 'तमर्घ्यमर्घा' इति पाठान्तरम् ।⁴ 'पर्वताकृती' इति पाठान्तरम् ।<br>⁵ 'नवाम्बुज' इति पाठान्तरम् ।
<div align="right">पृष्ठम् :- ०२</div>
शिशुपालवधे प्रथमः सर्गः
रथाङ्गपाणेः पटलेन रोचिषाम्<br>ऋषित्त्विषः संवलिता विरेजिरे ।<br>चलत्पलाशान्तरगोचरास्तरोस्<br>तुषारमूर्तेरिव नक्तमंशवः ॥ २१ ॥<br><br>✡ यहाँ पर कवि भगवान् श्रीकृष्ण और नारदजी के श्यामल और गौरवर्ण किरणों के सम्मिश्रण से एकवर्णत्व का वर्णन करता है—<br>प्रफुल्लपिच्छन्निभैरभीषुभिः<br>शुभैश्च सप्तच्छदपांशुपाण्डुभिः ।<br>परस्परेणच्छुरितामलच्छवी<br>तदैकवर्णाविव तौ बभूवतुः ॥ २२ ॥<br><br>✡ कवि वर्णन कर रहा है कि महर्षि नारद के समागम से भगवान् श्रीकृष्ण को इतना हर्ष हुआ कि वह समा नहीं सका—<br>युगान्तकालप्रतिसंहतात्मनो¹<br>जगन्ति यस्यां सविकासमासत ।<br>तनौ ममुस्तत्र न कैटभद्विषस्<br>तपोधनाभ्यागमसम्भवा मुदः ॥ २३ ॥<br><br>✡ प्रस्तुत श्लोक में भगवान् श्रीकृष्ण के ‘पुण्डरीकाक्ष’ नाम की सार्थकता बताई है—<br>निदाघधामानमिवाधिदीधितिं<br>मुदा विकासं मुनि²मभ्युपेयुषी ।<br>विलोचने बिभ्रदधिश्रितश्रिणी<br>स पुण्डरीकाक्ष इति स्फुटोऽभवत् ॥ २४ ॥<br><br>✡ इसके पश्चात् भगवान् श्रीकृष्ण का नारदजी से वार्तालाप का वर्णन किया जा रहा है—<br>सितं सितिम्ना सुतरां मुनेर्वपुर्<br>विसारिभिः सौधमिवाथ लम्भयन् ।<br>द्विजावलि³व्याजनिशाकरांशुभिः<br>शुचिस्मितां वाचमवोचदच्युतः ॥ २५ ॥<br><br>✡ भगवान् श्रीकृष्ण के मुख से नारदजी के दर्शन का महत्त्व बतलाया गया है—हरत्यघं सम्प्रति हेतुरेष्यतः<br>शुभस्य पूर्वाचरितैः कृतं शुभैः ।<br>शरीरभाजां भवदीयदर्शनं<br>व्यनक्ति कालत्रितयेऽपि योग्यताम् ॥ २६ ॥<br><br>✡ प्रस्तुत श्लोक में श्रीकृष्ण जी नारदमुनि से कह रहे हैं कि आपका तेज सहस्रों सूर्य के तेज से भी बढ़कर है—<br>जगत्यपर्याप्तसहस्रभानुना<br>न यन्नियन्तुं समभावि भानुना ।<br>प्रसह्य तेजोभिरसङ्ख्यतां गतैर्<br>अदस्त्वया नुन्नमनुत्तमं तमः ॥ २७ ॥<br><br>✡ यहाँ पर भगवान् श्रीकृष्ण नारद जी को वेदों का अक्षयनिधि बतलाते हैं—<br>कृतः प्रजाक्षेमकृता प्रजासृजा<br>सुपात्रनिक्षेपनिराकुलात्मना ।<br>सदोपयोगेऽपि गुरुस्त्वमक्षयो⁴<br>निधिः श्रुतीनां धनसम्पदामिव ॥ २८ ॥<br><br>✡ श्रीकृष्ण जी नारद से कह रहे हैं कि आपके दर्शन से कृतकृत्य होकर भी मैं आपके सारगर्भित वचन सुनना चाहता हूँ—<br>विलोकनेनैव तवामुना मुने !<br>कृतः कृतार्थोऽस्मि निबर्हितांहसा⁵ ।<br>तथापि शुश्रूषुरहं गरीयसीर्<br>गिरोऽथवा श्रेयसि केन तृप्यते ? ॥ २९ ॥<br><br>✡ प्रस्तुत श्लोक में भगवान् श्रीकृष्ण जी के आगमन का उद्देश्य पूछते हैं—<br>गतस्पृहोऽप्यागमनप्रयोजनं<br>वदेति वक्तुं व्यवसीयते यया ।<br>तनोति नस्तामुदितात्मगौरवो<br>गुरुस्त्वैवागम एष धृष्टताम् ॥ ३० ॥<br><br>✡ अब नारद जी उत्तर में अपना कथन आरम्भ करते हैं—

¹ 'संहतात्मना' इति पाठान्तरम् ।<br>² 'यति' इति पाठान्तरम् ।<br>³ 'द्विजावली' इति पाठान्तरम् ।⁴ 'क्षतिर्' इति पाठान्तरम् ।<br>⁵ 'निबृंहितांहसा' इति पाठान्तरम् ।
<div align="right">पृष्ठम्-: ०३</div>

शिशुपालवधे प्रथमः सर्गः


इति ब्रुवन्तं तमुवाच स व्रती
न वाच्यमित्थं पुरुषोत्तम ! त्वया ।
त्वमेव साक्षात्करणीय इत्यतः
किमस्ति कार्य्यं गुरु योगिनामपि ॥ ३१॥

✡ ऊपर जो कहा गया है कि आप ही योगियों द्वारा साक्षात्कारणीय हैं उसी का समर्थन करते हुए नारद जी कह रहे हैं—
उदीर्णरागप्रतिरोधकं जनैर्
अभीक्ष्णमक्षुण्णतयातिदुर्गमम् ।
उपेयुषो मोक्षपथं मनस्विनस्
त्वमग्रभूमिर्निरपायसंश्रया ॥ ३२॥

✡ नारद जी श्रीकृष्ण से कहते हैं कि कपिल आदि महर्षि प्रकृति से विविक्तरूप से वेद्य सांख्योक्त पुरुष आपको ही मानते हैं—
उदासितारं निगृहीतमानसैर्
गृहीतमध्यात्मदृशा कथञ्चन ।
बहिर्विकारं प्रकृतेः पृथग्विदुः
पुरातनं त्वां पुरुषं पुराविदः ॥ ३३॥

✡ इस प्रकार भगवान् के निर्गुणस्वरूप का वर्णन करके अब उपयोगी सगुण रूप का वर्णन आगे के ६ श्लोकों में करते हैं। सर्वप्रथम वराहावतार लेकर पृथ्वी के उद्धार का वर्णन किया गया है—
निवेशयामासिथ हेलयोद्धृतं¹
फणाभृतां छादनमेकमोकसः ।
जगत्त्रयैकस्थपतिस्त्वमुच्चकैर्
अहीश्वरस्तम्भशिरःसु भूतलम् ॥ ३४॥

✡ प्रस्तुत श्लोक में श्रीकृष्ण की अपूर्व महिमा का नारदजी वर्णन कर रहे हैं—
अनन्यगुर्व्या²स्तव केन केवलः
पुराणमूर्तेर्महिमाऽवगम्यते ।
मनुष्यजन्माऽपि सुरासुरानुगैर्
भवान् भवच्छेदकरैः³ करोत्यधः ॥ ३५॥


✡ नारद मुनि भगवान् श्रीकृष्ण से कह रहे हैं कि पृथ्वी का भार हलका करने के लिए आप अवतीर्ण होकर उसे अधिक भारवती बना रहे हैं—
लघूकरिष्यन्नतिभारभङ्गुराम्
अमूं किल त्वं त्रिदिवादवातारः ।
उदूढलोकत्रितयेन साम्प्रतं
गुरुर्धरित्री क्रियतेतरां त्वया ॥ ३६॥

✡ इस श्लोक में महर्षि नारद द्वारा प्रकारान्तर से श्रीकृष्ण के अवतार का महत्त्व वर्णन किया गया है—
निजौजसोज्जासयितुं जगद्द्रुहाम्
उपाजिहीथा न महीतलं यदि ।
समाहितैरप्यनिरूपितस्ततः
पदं दृशः स्याः कथमीश ! मादृशाम् ? ॥ ३७॥

✡ नारद जी कह रहे हैं हे श्रीकृष्ण ! दुष्टों को दमन करने की क्षमता आप में ही हैं दूसरे के द्वारा वह साध्य नहीं—
उपप्लुतं पातुमदो मदोद्धतैस्
त्वमेव विश्वम्भर ! विश्वमीशिषे ।
ऋते रवेः क्षालयितुं क्षमेत कः
क्षपातमस्काण्डमलीमसं नभः ॥ ३८॥

✡ आपने जो कंस आदि अल्पपराक्रमी राजाओं का संहार किया है, वह अपार सामर्थ्यवाले आपकी प्रशंसा नहीं अपितु तिरस्कार है—
करोति कंसादिमहीभृतां वधाज्
जनो मृगाणामिव यत्तव⁴ स्तवम् ।
हरे !⁵ हिरण्याक्षपुरःसरासुर-
द्विपद्विषः प्रत्युत सा तिरस्क्रिया ॥ ३९॥

✡ इस प्रकार श्रीकृष्ण की प्रशंसा करने के पश्चात् महर्षि नारद अपने आगमन के प्रयोजन को बतलाने का उपक्रम करते हैं—
प्रवृत्त एव स्वयमुज्झितश्रमः
क्रमेण पेष्टुं भुवनद्विषामसि ।
तथापि वाचालतया युनक्ति मां
मिथस्त्वदाभाषणलोलुपं मनः ॥ ४०॥


¹ ‘हेलयोद्धृतम्’ इति पाठान्तरम् ।
² ‘अनन्यगुर्वी’ इति पाठान्तरम् ।
³ ‘भवोच्छेदकरः’ इति पाठान्तरम् ।
⁴ ‘यस्तव’ ‘यमिति’ वा पाठान्तरम् ।
⁵ ‘हरेर्’ इति पाठान्तरम् ।

पृष्ठम्-: ०४