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सर्वकोश
शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished699 पृष्ठ

पृष्ठ 581, कुल 699 में से

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पृष्ठ 581

का० ४, अ० २, ब्रा० ३, कं० ५-१३ शतपथब्राह्मण / ५६३
का। जो पिछले सवन का है उसे पहले करता है, जो पहले का है उसे पीछे। इस प्रकार दोनों को
मिला देता है। इसीलिए ये शरीर के जोड़ भी मिले हुए हैं। यह इस प्रकार और यह इस प्रकार
(हाथ के इशारे से बताकर) चूंकि इस ग्रह से उसका आत्मा सुघटित है, इसलिए यह इसकी
आयु हैं ॥५॥
यह (उक्थ्य ग्रह) इन्द्र का विशेष भाग या कामधेनु हैं। प्रातःसवन में तीन उक्थ्यों के
लिए (विशेष मन्त्रों के लिए) इसके तीन भाग करता है; दोपहर के सवन में तीन को; ये छः
हुए। छः ही ऋतुएँ हैं। ये ऋतुएँ ही पृथिवी पर सब कामनाओं को पकाती हैं। इसलिए यह
कामधेनु या इन्द्र का विशेष भाग है ॥६॥
इसको पुरोरुक् के बिना ही लेता है। उक्थ्य पुरोरुक् है। पुरोरुक् ऋक् है। उक्थ्य ऋक्
है। साम ग्रह है। यह जो जपा जाता है वह यजुः है। ये पुरोरुक् ऋचाएं पहले ऋक् से अलग
थीं, यजुः से अलग थीं, साम से अलग थीं ॥७॥
वे देव बोले, 'इनको यजुओं में मिला दें, इस प्रकार यह बहुत बड़ी विद्या हो जायगी।'
तब उन्होंने इनको यजुओं में मिला दिया और यह बहुत बड़ी विद्या हो गई ॥८॥
इसको बिना पुरोरुक् के क्यों लेता है? उक्थ्य पुरोरुक् है। ऋक् पुरोरुक् है, ऋक् उक्थ्य
है। चूंकि इसको उक्थ्यों में से लेता है, इसलिए यह पुरोरुक्वाला हो जाता है। इसलिए इसको
बिना पुरोरुक् के लेता है ॥९॥
इसको इस मन्त्र से लेता है, "उपयामगृहीतोऽसीन्द्राय त्वा बृहद्वते वयस्वते" (यजु०
७।२२)—"तुझको आश्रय के लिए लिया गया है, बड़े और आयुवाले इन्द्र के लिए।" इन्द्र यज्ञ
का देवता है, इसलिए कहा कि बड़े और आयुवाले इन्द्र के लिए। 'बड़े और आयुवाले' का
अर्थ हैं वीर्यवाले, पराक्रमवाले। "उक्थाव्यं गृह्णामि" (यजु० ७।२२)—"उक्थ्यों से इसे लेता
हूँ।" "यत्त ऽ इन्द्र बृहद्वयः" (यजु० ७।२२) अर्थात् "हे इन्द्र, जो तेरा पराक्रम है।" "तस्मै त्वा
विष्णवे त्वां" (यजु० ७।२२)—यज्ञ की आयु के लिए इसको ग्रहण करता है, इसलिए कहा,
"उसके लिए तुझको, विष्णु के लिए तुझको।" "एष ते योनिरुक्थेभ्यस्त्वा" (यजु० ७।२२)—
"यह तेरी योनि है, उक्थ्यों के लिए तुझे।" ऐसा कहकर उसको रख देता है, उक्थों के लिए उसे
लेता है ॥१०॥
इस मन्त्रांश से बाँटता है, "देवेभ्यस्त्वा देवाव्यं यज्ञस्यायुषे गृह्णामि" (यजु० ७।२२)
—"तुझे देवों के लिए तथा यज्ञ की आयु के लिए लेता हूँ।" जो इस प्रकार करेगा वह शासन
करनेवाला होगा। अब उसे प्रत्येक देवता के लिए बाँट देना चाहिए ॥११॥
"मित्रावरुणाभ्यां त्वा देवाव्यां यज्ञस्यायुषे गृह्णामि" (यजु० ७।२३)—यह मित्रा-
वरुण के लिए, क्योंकि मित्रावरुणी मन्त्रों में (उद्गाता लोग) उसी की स्तुति करते हैं और मैत्रा-
वरुणी शस्त्र को होता पढ़ता है, और मैत्रावरुण के लिए ही आहुति दी जाती है ॥१२॥
"इन्द्राय त्वा देवाव्यं यज्ञस्यायुषे गृह्णामि" (यजु० ७।२३)—"देव के अर्पण तुझको
इन्द्र के लिए, यज्ञ की आयु के लिए लेता हूँ।" यह भाग ब्राह्मणाच्छंसी के लिए होता है। इन्द्र-
सम्बन्धी मन्त्रों के साथ इसके लिए स्तुति की जाती है। शस्ता भी ऐसे ही मन्त्रों से पढ़ा जाता
है जिनमें इन्द्र शब्द आया हो और इन्द्रवाले मन्त्र से ही आहुति दी जाती है ॥१३॥