शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 531, कुल 699 में से
संदर्भ में पढ़ेंकां० ३, अ० ६, ब्रा० ३, कं० १६-२६ शतपथब्राह्मण / ५१३
को लाओ। एकधनवाले, आओ। आग्नीध्र वसतीवरी और होता के चमसों के साथ चत्वाल पर
खड़े हो।' यह मिश्रित सन्देश है ॥१६॥
वे चत्वाल के पीछे और आग्नीध्र के आगे उत्तर की ओर बढ़ते हैं। अब जिधर को जल
होते हैं उधर को चलते हैं। वे वहाँ पत्नियोंसहित जाते हैं। पत्नियों के साथ वहाँ क्यों जाते हैं,
इसका कारण यह है- ॥१७॥
जब यज्ञ का सिर काटा गया तो उसका रस बहकर जलों में मिल गया। उसकी गन्धर्व
सोमरक्षकों ने रक्षा की ॥१८॥
तब देवता बोले- 'ये जो गन्धर्व हैं वे हमारे लिए भयङ्कर हैं। हम इस यज्ञ के रस को
कहाँ ले जावें कि भय से मुक्त हो जायँ' ॥१९॥
उन्होंने कहा- 'ये गन्धर्व स्त्रियों के अभिलाषी हैं। पत्नियों के साथ चलना चाहिए।
गन्धर्व अवश्य ही स्त्रियों के पीछे फिरेंगे और हम यज्ञ के रस को ऐसे स्थान में ले जायँगे जो भय
से मुक्त हो' ॥२०॥
वे पत्नियों के साथ चले। गन्धर्व उनकी स्त्रियों के पीछे चले। और वे यज्ञ के रस को
ऐसे स्थान में ले गये जहाँ भय न था ॥२१॥
उसी प्रकार यह अध्वर्यु भी पत्नियों के साथ जाता है। गन्धर्व स्त्रियों के पीछे दौड़ते हैं
और यह यज्ञ के रस को सुरक्षित स्थान में ले जाता है ॥२२॥
वह जलों पर आहुति देता है। जब यह आहुति दी जाती है तो यज्ञ का रस उसको खींच
लेता है। वह उस तक उठता है और उसको पाकर पकड़ लेता है ॥२३॥
वह इस आहुति को क्यों देता है? वह यज्ञ के रस पर घी की आहुति देता है और
अपनी ओर उसको खींचता है। उसकी जलों से याचना करता है। जिन देवताओं के लिए वह
आहुति देता है उन्हीं को वह प्रसन्न करता है। इस प्रकार तृप्त होकर वे यज्ञ के रस को प्राप्त
करते हैं ॥२४॥
वह इस मन्त्र से आहुति देता है- "देवीरापोऽपां न पात्" (यजु० ६।२७) - "हे
दिव्य जलो, जलों की सन्तान।" जल दिव्य, है अतः कहा 'देवीरापोऽपां न पात्।' "यो व
ऽऊर्मिर्हविष्यः" (यजु० ६।२७) अर्थात् "आपकी तरंग हवि या यज्ञ के लिए उपयुक्त है।"
"इन्द्रियावान् मदिन्तमः" (यजु० ६।२७) अर्थात् "बलवान्, और स्वादिष्ट।" "तं देवेभ्यो
देवत्रा दत्त" (यजु० ६।२७) - "उसको देवों के देव को दो।" अर्थात् वह उसको उनसे माँगता
है। "शुक्रेभ्यः" (यजु० ६।२७) - शुक्र नाम है सत्य का, अर्थात् "सत्य के पालन करनेवाले के
लिए।" "येषां भाग स्थ स्वाहा" (यजु० ६।२७) - "जिनके तुम भाग हो।" क्योंकि वस्तुतः
यह उनका ही भाग है ॥२५॥
अब मैत्रावरुण चमस के द्वारा उस आहुति को तैराता है। "कार्षिरसि" (यजु०६।२८)
- "तू कार्षि अर्थात् कृषि-सम्बन्धी है।" जैसे आग कोयले को खा जाती है, ऐसे ही इस आहुति
को देवता खा जाता है। चूंकि सोम राजा का उस जल से अभिषेक होना है जो मैत्रावरुण ग्रह में