शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 489, कुल 699 में से
संदर्भ में पढ़ेंकां० ३, अ० ७, ब्रा० ३-४, कं० ९-१३ व १-४ शतपथब्राह्मण / ४७१
करनेवाला है।" साथी रक्षा करता है इसलिए कहता है 'उपावीरसि।' "उपदेवान् दैवीर्विशः
प्रागुः" (यजु० ६।७) [महीधर-भाष्य में 'विशेषायुः' पाठ है] - "दैवी लोग देवों के पास आये
हैं।" ये जो पशु हैं वे दैवी लोग हैं। जब वह 'उपदेवान्' आदि कहता है तो इसका तात्पर्य यह है
कि वह देवों के वश में आ गया है ॥९॥
"उशिजो वह्नितमान्" (यजु० ६।७) - उशिज = मेधावी, 'वह्नितम' = सबसे अच्छा
वाहक ॥१०॥
"देव त्वष्टर्वसु रम" (यजु० ६।७) - "हे देव त्वष्टा, धन में रम।" त्वष्टा ही पशुओं का
ईश है। पशु ही वसु हैं। जो पशु माने नहीं उन्हीं के लिए देवों ने त्वष्टा से कहा, 'देव त्वष्टर्वसु
रम' ॥११॥
"हव्या ते स्वदन्ताम्" (यजु० ६।७) - "हवि तुझको स्वादिष्ट लगें।" चूंकि वे स्वयं ही
मान गये कि हम हवि हो जायें, इसलिए कहा, 'हव्या ते स्वदन्ताम्' ॥१२॥
"रेवती रमध्वम्" (यजु० ६।८) - 'हे सुखी, सुख उठाओ।' पशु 'सुखी' हैं इसलिए कहा
"रेवती रमध्वम् । बृहस्पते धारया वसूनि" (यजु० ६।८) - 'हे बृहस्पति, धनों को धारो।' ब्रह्म
बृहस्पति है। पशु वसु हैं। जो पशु माने नहीं थे वे ब्रह्म के साथ सुरक्षित थे। इसी प्रकार यह भी
उनको ब्रह्म के साथ सुरक्षित रख देता है जो मानते नहीं हैं, इसलिए कहता है 'बृहस्पते धारया
वसूनि।' पाश या फन्दा बनाकर वह उसके पशु के गले में डालता है। बाँधने के विषय में अगले
ब्राह्मण में है ॥१३॥
अध्याय ७- ब्राह्मण ४
फन्दा बनाकर (पशु के गले में) डालता है, इस मन्त्रांश से- "ऋतस्य त्वा देवहविः
पाशेन प्रति मुञ्चामि" (यजु० ६।८) - "हे देव-हवि, तुझको ऋत के फन्दे से बाँधता हूँ।" क्योंकि
जो रस्सी है वह वरुण की है। इसलिए ऋत के फन्दे से उसको बाँधता है (अर्थात् वरुण की रस्सी
में ऋत का फन्दा लगाता है)। इसलिए वह वरुण की रस्सी उसको नहीं सताती ॥१॥
"धर्षा मानुषः" (यजु० ६।८) - "मनुष्य धृष्ट है।" क्योंकि पहले मनुष्य (पशु के) पास
तक नहीं जा सकता था। लेकिन जब उसने उसको ऋत के पाश से देव-हवि के रूप में बाँध लिया
तब मनुष्य उसके पास जा सकता है, इसलिए कहा 'धर्षा मानुषः' ॥२॥
अब वह उस (पशु) को यूप में बाँधता है, इस मन्त्रांश से- "देवस्य त्वा सवितुः प्रसवे-
ऽश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्यामग्नीषोमाभ्यां जुष्टं नियुनज्मि" (यजु० ६।१६) - "देव सविता
की प्रेरणा से दोनों अश्विनों के बाहुओं और पूषा के हाथों से तुझको अग्नि और सोम का प्रिय
बनाता हूँ।" जिस प्रकार एक देवता को निर्दिष्ट करके हवि की आहुति दी जाती है, उसी प्रकार
दो देवताओं को निर्दिष्ट करके आहुति दी जाती है। अब वह जल-सिंचन करता है। जल-सिंचन
का वही एक तात्पर्य है अर्थात् यज्ञ के लिए पवित्र करना ॥३॥
वह इस मन्त्र से जल-सिंचन करता है- "अद्भ्यस्त्वौषधीभ्यः" (यजु० ६।१६) - "तुझको
जलों और ओषधियों के लिए।" जिससे उस (पशु) की स्थिति है उसी से उसको पवित्र करता
है। क्योंकि जब जल बरसता है तब पृथिवी पर ओषधियां उत्पन्न होती हैं। ओषधियों को खाकर